लखनऊ में 'नवपरिमल' का स्थापना दिवस समारोह:पत्रिका 'शंख-सीपी' का विमोचन; साहित्य समाज की संवेदनशील चेतना का दर्पण




लखनऊ के गोमती नगर स्थित स्मृति भवन में शनिवार को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘नवपरिमल’ का स्थापना दिवस समारोह आयोजित किया गया। इसी अवसर पर पत्रिका ‘शंख-सीपी : वार्षिकांक–2026’ (स्मृति विशेषांक) का विमोचन भी हुआ। इस कार्यक्रम में साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और प्रशासनिक जगत की कई प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं, जिससे आयोजन खास बन गया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, कवि, शिक्षाविद् और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता काव्यश्री रामप्रकाश त्रिपाठी ‘प्रकाश’ ने की। लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। विशिष्ट अतिथियों में जयशंकर मिश्र (आईएएस), प्रो. सर्वनारायण झा, सुमोना पाण्डेय और इं. राजेश अग्रवाल शामिल थे। नवपरिमल की संरक्षक मंडल सदस्य पद्मश्री डॉ. विद्या बिन्दु सिंह और महेशचन्द्र द्विवेदी (आईपीएस) भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। संस्था लखनऊ में लगातार साहित्य सेवा कर रही कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुई। इं. अशोक कुमार मेहरोत्रा ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की, जिसके बाद संस्था के महासचिव इं. उदयभान पाण्डेय ‘भान’ ने नवपरिमल का कुलगीत सुनाया। महासचिव उदयभान पाण्डेय ने बताया कि ‘नवपरिमल’ की स्थापना 23 मई 1977 को स्व. मदन मोहन सिन्हा ‘मनुज’ ने पोर्टब्लेयर में की थी। वर्ष 1999 से यह संस्था लखनऊ में लगातार साहित्य सेवा कर रही है। उन्होंने यह भी बताया कि आने वाला वर्ष संस्था का स्वर्ण जयंती वर्ष होगा, जिसे बड़े स्तर पर मनाया जाएगा। साहित्य समाज की संवेदनशील चेतना का दर्पण इसके बाद अतिथियों द्वारा ‘शंख-सीपी : वार्षिकांक–2026’ का लोकार्पण किया गया। मुख्य संपादक डॉ. कुँवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’ ने जानकारी दी कि पत्रिका में देशभर के प्रतिष्ठित साहित्यकारों की रचनाएं शामिल हैं। प्रधान संपादक डॉ. अरुणेन्द्रचन्द्र त्रिपाठी ने नवपरिमल को भारतीय लोक संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा देने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था बताया। अपने संबोधन में प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा कि साहित्य समाज की संवेदनशील चेतना का दर्पण है और ऐसी पत्रिकाएं सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने में सहायक होती हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में रामप्रकाश त्रिपाठी ‘प्रकाश’ ने नवपरिमल की 49 वर्षों की साहित्यिक यात्रा को प्रेरणादायी बताया।



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