महाभारत का युद्ध मानव इतिहास में धर्म और अधर्म के बीच लड़ा गया सबसे भीषण युद्ध माना जाता है. माना जाता है कि यह युद्ध 18 दिनों तक चला था, जिसमें कुल 18 अक्षौहिणी (प्राचीन भारत में चतुरंगिणी सेना की सबसे बड़ी और मानक माप इकाई) सेनाओं ने भाग लिया था. कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी, जबकि पांडवों की ओर से केवल 7 अक्षौहिणी सेनाएं युद्ध में उतरी थीं. उस समय लगभग कोई भी राजा-महाराजा इस युद्ध से स्वयं को पूरी तरह अलग नहीं रख पाया था. लेकिन कुछ ऐसे महान योद्धा भी थे, जिन्होंने अपनी अपार शक्ति के बावजूद इस युद्ध में हिस्सा नहीं लिया था. आइए जानते हैं ऐसे ही 4 महान योद्धाओं के बारे में, जिन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया था.
बलराम जी
भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी यदुवंश के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में से एक थे. उन्होंने मगध नरेश जरासंध के युद्ध अभियानों को कई बार विफल किया था. कथा के मुताबिक, एक बार जब कौरवों ने श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को बंदी बना लिया था, तब बलराम जी अकेले ही हस्तिनापुर पहुंचे थे. वहां कौरवों ने उनका अपमान किया, जिससे क्रोधित होकर उन्होंने अपने हल से हस्तिनापुर को गंगा में डुबाने के लिए खींचना शुरू कर दिया. भयभीत होकर कौरवों ने तुरंत सांब को मुक्त कर दिया था.
कहा जाता है कि बलराम जी शेषनाग के अवतार माने जाते हैं. दुर्योधन उनका प्रिय शिष्य था, लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन का साथ देने के कारण उन्होंने इस युद्ध में निष्पक्ष रहना ही उचित समझा. यदि वे कौरवों की ओर से युद्ध करते, तो परिणाम कुछ और भी हो सकता था.
रुक्मी
रुक्मिणी के भाई और श्रीकृष्ण के साले रुक्मी भी एक महान योद्धा थे. वे विदर्भ के राजा भीष्मक के पुत्र थे और विजय नामक धनुष धारण करते थे. जब श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया था, तो रुक्मी ने उन्हें रोकने के लिए सेना के साथ उनका पीछा किया. उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि यदि वे श्रीकृष्ण को बंदी बनाकर नहीं लाए, तो वे अपने राज्य कुंडिनपुर (विदर्भ की राजधानी) वापस नहीं जाएंगे. लेकिन युद्ध में वे श्रीकृष्ण से हार गए.
श्रीकृष्ण ने उनका अपमान करते हुए उनकी दाढ़ी-मूंछ काट दी. अपनी प्रतिज्ञा के कारण रुक्मी कभी अपने राज्य वापस नहीं लौटे और महाभारत युद्ध में भी उन्होंने भाग नहीं लिया था.
वीर बर्बरीक
भीम के पौत्र वीर बर्बरीक को महाभारत का सबसे महान धनुर्धर माना जाता है. वे घटोत्कच और मोरवी के पुत्र थे. बर्बरीक ने प्रतिज्ञा की थी कि वे युद्ध में हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देंगे. जब वे कुरुक्षेत्र की ओर बढ़े, तो श्रीकृष्ण उनकी इस प्रतिज्ञा से चिंतित हो गए, क्योंकि वे जानते थे कि अंततः कौरवों की हार निश्चित है.
बर्बरीक के पास केवल तीन बाण थे, लेकिन उनकी शक्ति इतनी अद्भुत थी कि वे पूरे युद्ध को कुछ ही क्षणों में समाप्त कर सकते थे. इसी कारण श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धारण कर उनसे दान में उनका मस्तक मांग लिया. बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश दान कर दिया और इस प्रकार वे युद्ध में भाग नहीं ले सके, लेकिन उन्होंने पूरे युद्ध को अपने दृष्टिकोण से देखा.
विदुर
महाभारत के समय विदुर ने युद्ध में हिस्सा नहीं लिया था. उन्होंने खुद को इस लड़ाई से दूर रखा और सिर्फ एक दर्शक बनकर सब कुछ देखा. विदुर राजा धृतराष्ट्र के मुख्य सलाहकार थे, लेकिन एक बार दुर्योधन ने उनका अपमान कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने दरबार और युद्ध दोनों से दूरी बना ली. विदुर हमेशा धर्म और सच्चाई के पक्ष में खड़े रहने वाले व्यक्ति थे. उन्हें अच्छी तरह समझ आ गया था कि कौरव गलत रास्ते पर चल रहे हैं. यही वजह थी कि उन्होंने किसी भी पक्ष का साथ देने के बजाय तटस्थ रहना सही समझा.














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