अयोध्या
मई के महीने में जब राम मंदिर की चढ़ावा-चोरी का पता चला, तो राजनीति के कुशल खिलाड़ी अपनी अपनी सोशल मीडिया की टीमें लेकर उतर पड़े, एक बड़ा नैरेटिव बनाने। नैरेटिव ये था कि 500 साल के संघर्षों के बाद हिंदुओं ने जो राम मंदिर बनाया था, उसके चढ़ावे की चोरी हिंदुओं ने कर ली। जितने आरोप कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ओर से लगाए गए हैं, उन्हें ध्यान से देखें तो पता चलता है कि उनका निशाना आरएसएस या बीजेपी नहीं है, बल्कि मोदी,योगी और देश के तमाम हिंदुओं की वो आस्था है, जिसे हजारों साल से हज़ारों आक्रमणकारी नहीं डिगा सके।
प्रयास ये था कि सोशल मीडिया पर इस चिंदी-चोरी को लेकर हिंदुओं का, हिंदू पूजा-पद्धति का इतना मान-मर्दन किया जाय कि देश के 125 करोड़ हिंदू ये मानने लगें कि वे हैं ही इस अपमान के लायक। उन्हें इतना आहत किया जाए कि वे अपने देवी-देवताओं, अपनी धार्मिक पंपराओं पर संदेह करने लगें। साज़िश ये थी कि उस संदेह से उपजी निराशा जब गुस्से में बदले, तो चुनावों में वो गुस्सा वोटों की शक्ल में बदल कर आए और यूपी में बीजेपी 2027 का विधानसभा चुनाव हार जाए। भारत में पूजास्थलों यानी मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों के दान या फंडों में हेराफेरी या गड़बड़ी की खबरें अक्सर आती रही हैं। लेकिन चूंकि राम मंदिर का मुद्दा था, यूपी में चुनाव पास ही है, इसलिए ये नैरेटिव गढ़ने की कोशिश हो रही है कि हिंदू हैं ही महापापी। वे अपने आराध्य देवों के चढ़ावे में चोरी करते हैं और वे उस राम मंदिर के लायक थे ही नहीं, जिसके लिए 500 बरसों से उनका समाज संघर्ष कर रह था।
ये वही कोशिश थी जो मुसलमानों ने भारत पर कब्जे के बाद की थी। यानी साबित करो कि हिंदू धर्म और संस्कृति किसी लायक नहीं है, ये न खाना जानते हैं, न पहनना, न पढ़ना-लिखना। इसके पीछे भी साज़िश यही थी कि किसी कौम को गुलाम बनाना है तो उसकी पूरी संस्कृति को ही पिछड़ा कह दो। कालांतर में अंग्रेज़ों ने भी वही किया और अंग्रेज़ी भाषा के ज़रिए ये साबित करने की कोशिश की कि जिसे अंग्रेज़ी बोलनी और लिखनी आती है, वही तरक्की के योग्य है। दुर्भाग्य से ये नैरेटिव आज भी चल रहा है। उसके पीछे की वजहों पर चर्चा फिर कभी।
राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी पर राजनैतिक दल जो भी नैरेटिव देने की कोशिश कर रहे हैं, वो बिल्ली के भाग से छींका टूटने जैसा ही है। चोरी की जो भी घटना हुई, वह दुखद है। लेकिन इस पर यूपी के मुख्यमंत्री का तुरत-फुरत एक्शन इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने कितनी गंभीरता से इसे लिया। जांच चल रही है और आरोपियों का दोष साबित होगा तो कानूनन उन्हें सज़ा भी होगी। लेकिन मामला राजनीति के उन बाघड़-बिल्लों का है, जिन्हें सालों से सत्ता की रोटी मिल नहीं रही। इनमें कांग्रेस, सपा, राजद और केजरीवाल समेत देश की हर वो पार्टी है जिसने न सिर्फ राम मंदिर पर सवाल खड़ा किया था, बल्कि ये भी कहा था कि राम काल्पनिक है और वे दरअसल थे ही नहीं।
रामायण को कपोल-कल्पना बताने वाले इतिहासकारों ने इन राजनैतिक दलों को मौका दिया और ये नैरेटिव भी गढ़ा गया कि राम मंदिर लेकर क्या करोगे। आओ चलो उस जगह कोई अस्पताल बनवा दें, बच्चों का कोई स्कूल बनवा दें। ध्यान देने वाली बात ये है कि जब बाबरी मस्जिद 500 सालों तक खड़ी रही, तब किसी ने ये सुझाव नहीं दिए कि आओ चलो, बाबरी मस्जिद की जगह स्कूल या अस्पताल बनवा दें। इन सारे झूठों-कुतर्कों के बीच जब राम मंदिर बन गया तो हिंदू आस्था के प्रतीकों और गौरव चिह्नों के प्रति आम हिंदुओं में सम्मान और स्वीकार्यता बढ़ने लगी। चुनाव-दर-चुनाव विपक्षी दलों के राजनैतिक एजेंडे की पोल खुलती गई और हिंदुत्व और राम मंदिर की पुरजोर वकालत करने वाली बीजेपी देश के 21 राज्यों में सत्तारूढ़ दल की हैसियत से स्थापित हो गई।
सच्चाई ये है कि भारत का राजनैतिक विपक्ष बीजेपी की सफलता को पचा नहीं पा रहा है, इसीलिए वो कभी वोट चोरी का मुद्दा उठाते हैं, तो कभी उम्मीदवार चोरी का। लेकिन उनका कोई मुद्दा चला नहीं और इसी बीच चढ़ावे की चोरी की खबर आई तो सारे राजनैतिक गिद्ध उसकी ओर लपक उठे। सबको लगता है कि अब तो बीजेपी बैकफुट पर आ जाएगी और 2027 का यूपी चुनाव हार जाएगी। लेकिन अखिलेश, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव इन तीनों को राजनीति विरासत में मिली है, इसीलिए इन्हें भारतीय जन-मानस का पता नहीं है। इन्हें नहीं पता कि चढ़ावा-चोरी से आम हिंदू नाराज़ हो सकता है, लेकिन वोट सपा, कांग्रेस या विपक्ष के किसी भी गठबंधन को दे देगा, ये किस किताब में लिखा है।
हिंदू जनमानस का गुस्सा बेशक हो सकता है कि इस चोरी के दोषी जो भी हों, बड़े से बड़ा नाम भी क्यों न आए, उसे सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन आम हिंदू राम मंदिर के लिए बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद के संघर्षों को भूल कर केजरीवाल, अखिलेश यादव या राहुल गांधी की बात सुनेगा, ये सब वही लोग सोच सकते हैं, जिन्होंने इस देश की चुनावी राजनीति की धारा को या तो पास से देखा नहीं है, या पूर्वाग्रह से बुरी तरह से ग्रस्त हैं। आम हिंदू जानमानस की सोच है कि एक चोरी हो गई, जिसकी जांच जारी है। लेकिन उस चोरी को लेकर कोई सवा सौ करोड़ का जनसमूह किसी पार्टी के प्रति अपनी सोच बदल देगा, ये किसी स्वप्नजीवी की ही परिकल्पना हो सकती है या फिर हमारे विपक्षी दलों की।














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