रांची
सेंट्रल यूनिवर्सिटी आफ झारखंड (सीयूजे) के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की सहायक प्राध्यापक डा. शिखा चौरसिया को झारखंड काउंसिल आन साइंस, टेक्नोलाजी एंड इनोवेशन (जेसीएसटीआइ) के जनवरी 2026 चक्र के तहत एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक शोध परियोजना स्वीकृत हुई है।
इस परियोजना में चांडिल जलाशय के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में पानी के प्रवाह और गाद के जमा होने की प्रक्रिया का विज्ञानी अध्ययन किया जाएगा। चांडिल जलाशय झारखंड के महत्वपूर्ण जल संसाधनों में से एक है। यह क्षेत्र लोगों की विभिन्न जल संबंधी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है।
ऐसे में जलाशय की क्षमता और लंबे समय तक इसकी उपयोगिता बनाए रखना बेहद आवश्यक है। पिछले कुछ वर्षों में जलाशय के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में मृदा कटाव और गाद के बहकर जलाशय तक पहुंचने की समस्या बढ़ी है। शोध परियोजना का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि जलाशय में इतनी अधिक मात्रा में गाद किन क्षेत्रों और किन कारणों से पहुंच रही है।
क्षेत्र में अनियंत्रित खनन, पेड़ों की कटाई, भूमि के बदलते उपयोग और तेजी से हो रहे शहरी विस्तार के कारण मिट्टी के कटाव की समस्या बढ़ सकती है। वर्षा के दौरान यही मिट्टी और अन्य अवसाद पानी के साथ बहकर जलाशय में पहुंचते हैं और वहां जमा हो जाते हैं।
जलाशय में लगातार गाद जमा होने से उसकी पानी रखने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है। यदि समय रहते इस समस्या का विज्ञानी समाधान नहीं किया गया, तो भविष्य में जलाशय के प्रभावी उपयोग और जल प्रबंधन पर इसका असर पड़ सकता है।
इसी महत्वपूर्ण समस्या को ध्यान में रखते हुए डॉ. शिखा चौरसिया के नेतृत्व में यह शोध परियोजना तैयार की गई है। परियोजना के दौरान जलग्रहण क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया जाएगा।विभिन्न स्थानों से आवश्यक आंकड़े और नमूने एकत्र किए जाएंगे। वर्षा, पानी के बहाव, मिट्टी के कटाव और गाद के परिवहन से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया जाएगा।
इसके साथ ही विज्ञानी माडल की मदद से यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि किस क्षेत्र से कितनी मात्रा में मिट्टी और गाद जलाशय तक पहुंच रही है। शोध के माध्यम से गाद के प्रमुख स्रोतों की पहचान की जाएगी। इसके बाद यह भी आकलन किया जाएगा कि गाद के जमा होने से चांडिल जलाशय की जल-भंडारण क्षमता पर कितना प्रभाव पड़ रहा है।
इस जानकारी के आधार पर जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी के कटाव को कम करने और जलाशय में गाद की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए व्यावहारिक और विज्ञानी उपाय सुझाए जाएंगे। इस परियोजना का लाभ केवल वर्तमान स्थिति को समझने तक सीमित नहीं रहेगा।
शोध से प्राप्त जानकारी का उपयोग भविष्य में जलग्रहण क्षेत्र के बेहतर प्रबंधन, जलाशय के संरक्षण और जल संसाधनों की दीर्घकालिक योजना तैयार करने में किया जा सकता है। इससे जलाशय की उपलब्ध जल-भंडारण क्षमता को बनाए रखने और पानी की उपलब्धता को अधिक विश्वसनीय बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
परियोजना में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी, रांची के विश्वविद्यालय भूगोल विभाग के डॉ. अभय कुमार सिंह सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में कार्य करेंगे। दो यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के बीच सहयोग से इस महत्वपूर्ण विषय पर बहुआयामी अध्ययन किया जाएगा।
डॉ. शिखा चौरसिया को जेसीएसटीआइ की यह शोध परियोजना मिलना सीयूजे के लिए गौरव की बात है। यह उपलब्धि सीयूजे के शिक्षकों द्वारा किए जा रहे गुणवत्तापूर्ण शोध कार्यों को दर्शाती है। साथ ही, यह झारखंड की पर्यावरणीय समस्याओं और जल संसाधनों से जुड़ी चुनौतियों के विज्ञानी समाधान की दिशा में सीयूजे के बढ़ते योगदान को भी सामने लाती है।
इस शोध से प्राप्त परिणाम भविष्य में चांडिल जलाशय और उसके जलग्रहण क्षेत्र के सतत विकास, बेहतर जल प्रबंधन और जल सुरक्षा के लिए उपयोगी आधार उपलब्ध करा सकते हैं। इससे न केवल जलाशय के संरक्षण में मदद मिल सकती है, बल्कि झारखंड में जल संसाधनों के विज्ञानी और टिकाऊ प्रबंधन की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलने की उम्मीद है।
















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