कुरुक्षेत्र
धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में गोबर अब केवल कचरा नहीं, बल्कि रोजगार और जैविक खेती का आधार बनने की दिशा में बढ़ रहा है। ज्योतिसर में गोबर से विभिन्न उत्पाद तैयार करने की पहल के तहत महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
यहां 20 से 25 महिलाओं को दो प्रशिक्षण सत्रों में गोबर से दीपक, धूप, अगरबत्ती, राखियां और ब्रेसलेट सहित अन्य उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्लांट में प्रतिदिन करीब तीन से पांच हजार गोबर के दीपक तैयार किए जा रहे हैं। दीपावली को देखते हुए इसकी तैयारी तेज कर दी गई है।
फाउंडर मेंबर मयंक बजाज ने बताया कि पहल का उद्देश्य केवल गोबर से उत्पाद तैयार करना नहीं, बल्कि बेसहारा छोड़ी जाने वाली गायों के लिए भोजन की व्यवस्था और महिलाओं को रोजगार से जोड़ना भी है। अक्सर दूध देना बंद करने के बाद लोग गाय को सड़क पर छोड़ देते हैं।
ऐसी गायें पोलिथिन और गंदगी खाने को मजबूर होती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य के साथ सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ता है। गाय के दूध ही नहीं बल्कि गोबर से भी आमदनी शुरू करने का एक दीपक जलाने का प्रयास किया है। दूसरी ओर गोशालाओं में गोबर के निस्तारण की समस्या रहती है।
गर्मी और बरसात में गोबर से आसपास का वातावरण भी प्रभावित होता है। नालियों या सीवर में बहाने से निकासी की समस्या होती है। इन सब बातों को देखते हुए गाय के गोबर को उपयोगी बनाने की पहल गोसंपदा फाउंडेशन की ओर से की गई है और इसमें जिला नगर आयुक्त अमन कुमार, कार्यकारी अधिकारी राजेश कुमार का विशेष सहयोग मिल रहा है। उपायुक्त विश्राम कुमार मीणा ने एक कार्यक्रम के दौरान फाउंडेशन की इस सोच को और बड़ा प्रयास करने का विचार दिया था।
दान पर निर्भरता नहीं, उत्पादों से आमदनी का प्रयास
मयंक बजाज के अनुसार यदि गाय के गोबर को उपयोगी उत्पादों में बदलकर रोजगार और आय का माध्यम बनाया जा सकता है तो इससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है। प्रयास है कि गायों के भोजन की व्यवस्था केवल दान पर निर्भर न रहे, बल्कि गोबर से तैयार उत्पादों की बिक्री से भी आय हो। इसके लिए श्रद्धालुओं और पर्यटकों को इन उत्पादों से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है।
उन्होंने बताया कि सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं से भी बातचीत चल रही है। आगे प्रत्येक गोशाला में उत्पादों की बिक्री के लिए काउंटर उपलब्ध कराने की योजना है, ताकि श्रद्धालु गोबर से बने दीपक, धूप-अगरबत्ती सहित अन्य उत्पाद खरीद सकें। रक्षाबंधन पर भी सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं ने गोबर से राखियां तैयार की थीं।
15 साल पहले शुरू हुई थी जैविक खेती की पहल
मयंक बजाज ने बताया कि गोबर के उपयोग को लेकर उनकी रुचि करीब 15 साल से रही है। उस समय खेती में यूरिया और रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ रहा था और जैविक खेती का चलन कम था। उन्होंने किसानों के बीच जाकर गोबर को बड़ा धन बताते हुए इससे खाद और जैविक उत्पाद तैयार करने पर काम शुरू किया था। अब इसी सोच को रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
उनके अनुसार गोबर से ऐसी जैविक खाद तैयार करने पर भी काम हो रहा है, जो यूरिया और डीएपी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल हो सके। अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से खाद को कम समय में तैयार करने का प्रयास है। इससे खेतों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
जैविक खाद से किसानों का खर्च घटाने का लक्ष्य
मयंक बजाज के अनुसार वर्तमान में किसानों को खाद और रासायनिक इनपुट पर काफी खर्च करना पड़ता है। जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के साथ कीटनाशकों के छिड़काव और फसलों में बीमारियों को कम करने की दिशा में भी काम किया जा सकता है। उनका कहना है कि आने वाले समय में इस माडल को किसानों और गोशालाओं से जोड़कर बड़े स्तर पर विकसित किया जाएगा।
















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