चर्चित भोजशाला विवाद में आज फैसला:पांच याचिकाओं और तीन इंटरवेंशन को सुनने के बाद फैसला रिजर्व; शांति और सौहार्द्र बनाने की अपील




धार के विवादित भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद को लेकर आज 15 मई को फैसला संभावित है। सुप्रीम कोर्ट के वकील और हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के सीनियर एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है। इस मामले में पांच याचिकाओं और तीन इंटरवेंशन को सुनने के बाद इंदौर हाईकोर्ट डबल बेंच ने फैसला रिजर्व रखा है। मामले में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के याचिककर्ता ने वीडियो जारी कर इसकी जानकारी दी है और उन्होंने सभी समुदायों से अपील की है कि न्याय पालिका पर सभी को विश्वास है। जो भी फैसला आए वह स्वीकार करें। शांति और सौहार्द्र बनाए रखना हम सभी का परम कर्त्तव्य है। उन्होंने डीजीपी, धार एसपी से निवेदन किया है कि निर्णय के मद्देनजर कानून व्यवस्था बनाए रखे। पैरवी करने वाले एडवोकेट विष्णु शंकर जैन और एडवोकेट विनय जोशी द्वारा भी सभी से शांति बनाए रखने की अपील की है। साल 2022 में शुरू हुआ था मामला दो दिन पहले हुई इस मामले में सुनवाई पूरी हुई थी। तब करीब दो घंटे से ज्यादा चली सुनवाई में सभी पक्षों ने अपने तर्क रखे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने भी अपना पक्ष रखा। पिछले एक माह से अधिक समय से चल रही सुनवाई के दौरान हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने अपने-अपने तर्क न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। यह मामला साल 2022 में तब शुरू हुआ था, जब रंजना अग्निहोत्री और उनके साथियों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार देने की मांग की थी। इसी प्रकरण में साल 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। इसके बाद 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। 6 अप्रैल 2026 से हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई, जो 12 मई तक चली। हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के तर्क दिए 6 से 9 अप्रैल तक हिंदू पक्ष की ओर से विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए अपने तर्क रखे। याचिकाकर्ता पक्ष ने कोर्ट में कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य भी पेश किए। इनमें ASI सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक अभिलेखों में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, स्तंभ, शिलालेख और देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीकों का उल्लेख शामिल रहा। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ब्रिटिशकालीन गजेटियर और इतिहासकारों के दस्तावेजों में भोजशाला को मां सरस्वती के मंदिर और विद्या केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही परिसर में संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मिलने तथा लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा होने का भी हवाला दिया गया। याचिकाकर्ता पक्ष का यह भी कहना था कि परिसर के कई संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पूर्व के हैं, जो मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। मुख्य याचिका के साथ चार अन्य याचिकाएं और एक अपील भी क्लब की गई थीं। समरांगण सूत्रधार ग्रंथ का हवाला याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने अदालत में स्थापत्य संबंधी तकनीकी तर्क भी रखे। उन्होंने कहा कि परमार राजा भोज के ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ में मंदिर निर्माण के जो मानक बताए गए हैं, भोजशाला की संरचना उनसे मेल खाती है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि ग्रंथ में वर्णित चौड़ाई और लंबाई का अनुपात 4:6 है, जबकि ASI सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भोजशाला की चौड़ाई 38.41 मीटर और लंबाई 57.45 मीटर दर्ज की गई है, जो लगभग उसी अनुपात में है। याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी कहा कि परिसर में मिले हवन कुंड की संरचना भी ग्रंथ में वर्णित नियमों के अनुरूप है। अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कोर्ट में यह भी कहा कि परिसर में मिले “सर्पबंदी” शैली के शिलालेख और अलंकरण परमारकालीन मंदिरों की संरचनाओं से मेल खाते हैं। उनके अनुसार यह समानता भोजशाला के मूल स्वरूप को हिंदू मंदिर स्थापत्य से जुड़ा बताती है। मुस्लिम पक्ष ने सर्वे रिपोर्ट पर उठाए सवाल सोमवार को हुई सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा, जबकि एडवोकेट तौसिफ वारसी कोर्ट में मौजूद रहे। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और ASI की ओर से प्रस्तुत तर्कों और सर्वे रिपोर्ट का विरोध किया गया। विपक्ष की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि परिसर लंबे समय से मुस्लिम समुदाय द्वारा कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है। वर्तमान व्यवस्था सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए स्थापित की गई थी। कुछ पक्षों ने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों की व्याख्या को लेकर मतभेद संभव हैं और वर्तमान धार्मिक व्यवस्था में बदलाव से सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने कहा कि सर्वे के दौरान उपलब्ध कराई गई वीडियोग्राफी और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं तथा रंगीन फोटो भी उपलब्ध नहीं कराए गए। उन्होंने कहा कि अयोध्या मामले में रामलला विराजमान की मूर्ति मौजूद थी, जबकि भोजशाला में ऐसी कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। सिविल कोर्ट को धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार मुस्लिम पक्ष ने तर्क दिया कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, जबकि हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जनहित याचिका के माध्यम से स्वयं को समाजसेवी बताना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। केंद्र और राज्य सरकार के साथ ASI ने भी कोर्ट में सर्वे रिपोर्ट, प्रशासनिक अभिलेख और संरक्षण संबंधी तथ्य पेश किए। याचिका में ये हैं प्रमुख मांगें हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के तर्क दिए 6 से 9 अप्रैल तक हिंदू पक्ष की ओर से विष्णुशंकर जैन, विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए अपने तर्क रखे। इसके बाद मुस्लिम पक्ष और अन्य पक्षकारों ने इन दावों पर आपत्ति दर्ज कराई। मुख्य याचिका के साथ चार अन्य याचिकाएं और एक अपील भी क्लब की गई थीं। सोमवार को हुई सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा, जबकि एडवोकेट तौसिफ वारसी कोर्ट में मौजूद रहे। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और ASI की ओर से प्रस्तुत तर्कों और सर्वे रिपोर्ट का विरोध भी किया था। सलमान खुर्शीद ने सर्वे रिपोर्ट पर उठाए सवाल एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने कहा कि सर्वे के दौरान उपलब्ध कराई गई वीडियोग्राफी और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं तथा रंगीन फोटो भी उपलब्ध नहीं कराए गए। उन्होंने कहा कि अयोध्या मामले में रामलला विराजमान की मूर्ति मौजूद थी, जबकि भोजशाला में ऐसी कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को तर्क दिया कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, जबकि हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जनहित याचिका के माध्यम से स्वयं को समाजसेवी बताना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।



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