धान की सीधी बुवाई टिकाऊ कृषि तकनीक:बलिया में जल-श्रम बचाकर किसान बढ़ा सकते हैं आय




धान विश्व की सबसे महत्वपूर्ण फसल है, जो वैश्विक आबादी के 60 प्रतिशत से अधिक लोगों का मुख्य भोजन है। पानी की बढ़ती कमी और खेती में बढ़ती मजदूरी के कारण किसान अब ऐसी वैकल्पिक फसल उत्पादन विधियों की तलाश कर रहे हैं, जो जल उत्पादकता बढ़ा सकें और खेती की लागत कम कर सकें। बलिया के सोहांव स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के शस्य वैज्ञानिक डॉ. सोमेंद्र नाथ ने बताया कि धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) एक टिकाऊ कृषि तकनीक है। डॉ. नाथ के अनुसार, धान की सीधी बुवाई मुख्य रूप से दो तरीकों से की जा सकती है: सूखी-सीधी बुवाई (ड्राई-डीएसआर) और गीली-सीधी बुवाई (वेट-डीएसआर)। यह विधि पौधों की रोपाई के बजाय सीधे मुख्य खेत में बीज बोने पर आधारित है। इसमें तैयार भूमि पर पहले से अंकुरित बीजों को गीली मिट्टी में बोया जा सकता है (छिटकवा या ड्रम सीडर द्वारा), या सूखे बीजों को छिटकवा और बीज-सह-उर्वरक यंत्र (सीड्रिल), हैप्पी सीडर या सुपर सीडर द्वारा बोया जा सकता है। सीधी बुवाई के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं। इससे श्रम, ऊर्जा और समय की काफी बचत होती है, साथ ही ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है। यह अगली फसलों की बेहतर वृद्धि और उत्पादकता के लिए अनुकूल मिट्टी का वातावरण भी प्रदान करती है। धान की सीधी बुवाई से खेत में पानी कम लगता है, जिससे मीथेन गैस का उत्सर्जन काफी कम होता है। बचाई गई ग्रीनहाउस (मीथेन) गैस के उत्सर्जन को कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के समतुल्य (CO2e) में मापा जाता है। आमतौर पर, एक एकड़ में धान की सीधी बुवाई करने से लगभग 1 से 1.5 कार्बन क्रेडिट (1 से 1.5 टन कार्बन) तक बचाया जा सकता है। किसान इन कार्बन क्रेडिट को बेचकर प्रति एकड़ 2500 से 3000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं, बशर्ते धान का उत्पादन डीएसआर विधि से बड़े पैमाने पर किया जा रहा हो।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में धान की सीधी बुवाई का उचित समय मई के अंतिम सप्ताह से 15 जून तक है। बुवाई से पहले धान के बीज को कवकनाशी जैसे कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब या थीरम से उपचारित करना अनिवार्य है। बुवाई के लिए बीज दर महीन दाने वाली किस्मों के लिए 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और मोटे दाने वाली प्रजातियों के लिए 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखनी चाहिए। खरपतवार प्रबंधन के लिए, खेत में पर्याप्त नमी होने पर बुवाई के जीरो से तीन दिन के भीतर पेंडीमिथलीन दवा का 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 400 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें। इसके बाद, जब फसल लगभग 25 दिन की हो जाए, तब बिसपायरीबैक सोडियम खरपतवारनाशी की 200 से 250 एमएल दवा को 400 लीटर पानी में घोलकर पुनः छिड़काव करें।



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