सीहोर में अधिकतम तापमान 44 डिग्री सेल्सियस दर्ज:सीवन नदी सूखी, पानी के लिए भटक रहे पक्षी, जून के दूसरे सप्ताह से बदल सकता है मौसम




सीहोर इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। धूप और आसमान से बरसती आग ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। जिले में तापमान लगातार 44 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है। हालात ऐसे हैं कि सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि बेजुबान पक्षी भी गर्मी से राहत पाने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। 46 डिग्री तक पहुंचा तापमान पिछले कुछ दिनों से सीहोर में तेज गर्मी का दौर जारी है। मौसम विभाग के अनुसार जिले का अधिकतम तापमान लगातार 43 से 46 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है। 18 मई – 44.5 डिग्री 19 मई – 45.8 डिग्री 20 मई – 46 डिग्री 21 मई – 44 डिग्री 22 मई – 43.2 डिग्री 23 मई – 43.5 डिग्री 24 मई – 43.3 डिग्री 25 मई – 44 डिग्री सूखी सीवन नदी किनारे पेड़ों में शरण ले रहे बगुले डाकघर से लाल मस्जिद की ओर जाने वाले मार्ग पर इन दिनों एक भावुक कर देने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है। यहां आसमान के सफेद दूत कहे जाने वाले बगुले घने पेड़ों की शाखाओं पर झुंड बनाकर राहत तलाशते दिखाई दे रहे हैं। बकरी पुल के पास से गुजरने वाली सीवन नदी पूरी तरह सूख चुकी है। जहां कभी पानी बहता था, वहां अब सिर्फ सूखी मिट्टी और धूल नजर आ रही है। ऐसे में नदी किनारे खड़े पुराने विशाल पेड़ इन पक्षियों के लिए सहारा बने हुए हैं। पानी की तलाश में भटके दर्जनों पक्षी अब सूखी नदी की तलहटी और पेड़ों की घनी छांव में सुस्ताते दिखाई दे रहे हैं। तपती हवाओं के बीच इन पेड़ों की हरियाली पक्षियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। जून के दूसरे सप्ताह से बदल सकता है मौसम भीषण गर्मी के बीच मौसम विभाग ने राहत भरी संभावना जताई है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस साल मानसून जल्दी सक्रिय हो सकता है। जून के दूसरे सप्ताह यानी 10 से 12 जून के बीच प्री-मानसून गतिविधियां शुरू होने के आसार हैं। इस दौरान ठंडी हवाएं, धूलभरी आंधी और गरज-चमक के साथ बारिश होने की संभावना है। इससे तापमान में गिरावट आएगी और लोगों को गर्मी से राहत मिल सकती है। सीवन नदी में फिर लौट सकती है रौनक मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जून के मध्य तक बारिश शुरू होने पर सूखी सीवन नदी में फिर पानी आने लगेगा। इससे न केवल लोगों को राहत मिलेगी, बल्कि पानी की तलाश में भटक रहे पक्षियों को भी नया जीवन मिल सकेगा। फिलहाल इन बेजुबान पक्षियों के लिए पेड़ों की छांव ही सबसे बड़ा सहारा बनी हुई है।



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