चंडीगढ़
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के अमृतसर स्थित ऐतिहासिक राम तीर्थ स्थल में 150 करोड़ रुपये की लागत से लव-कुश मंदिर बनाने का ऐलान किया है। इसके साथ ही उन्होंने पार्टी को सनातनी बताते हुए धार्म की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया। पंजाब सरकार जून महीने से सरकारी स्तर पर कई भक्ति संध्याओं का आयोजन कर रही है, जिन्हें अब प्रदेश के सभी 22 प्रमुख शहरों में आयोजित करने की योजना है। इसके अलावा, पटियाला के काली माता मंदिर के लिए 80 करोड़ रुपये का आवंटन, हर साल लगभग 1.5 लाख श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त तीर्थयात्रा योजना, मंदिरों को उनके प्रबंधन पर अधिक अधिकार देने वाला एक नया कानून और दर्जन से अधिक जाति कल्याण बोर्डों का गठन भी किया गया है।
आम आदमी पार्टी (AAP) की यह शॉफ्ट हिंदुत्व वाली राजनीति कोई नई बात नहीं है। 2020 के दिल्ली चुनाव में मतदान से ठीक पहले केजरीवाल ने टीवी पर हनुमान चालीसा का पाठ किया था। 2022 के गुजरात और हिमाचल चुनाव के दौरान भारतीय मुद्रा पर भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की तस्वीरें छापने की मांग उठाई गई थी। वहीं, 2024 में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान दिल्ली के सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में सुंदरकांड और रामचरितमानस पाठ का आयोजन कराया।
अपनी हिंदुत्व की राजनीति के लिए मशहूर भारतीय जनता पार्टी (BJP) जब-जब हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करती दिखती है तब-तब आम आदमी पार्टी अपनी रणनीति को सॉफ्ट-हिंदुत्व की ओर मोड़ देती है। पंजाब में भी अरविंद केजरीवाल की पार्टी ठीक वैसा ही कर रही, जैसा उसने पहले भी किया है।
पंजाब से भाजपा को कैसी उम्मीद?
पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट शेयर बढ़कर 18.5 प्रतिशत हो गया, जो कि 2019 में 9.63 प्रतिशत और 2022 के विधानसभा चुनाव में महज 6.6 प्रतिशत था। हालांकि भाजपा को कोई सीट हासिल नहीं हुई, लेकिन राज्य की 117 विधानसभा सीटों में से 24 पर उसने बढ़त हासिल की, जिनमें से लगभग सभी शहरी क्षेत्र हैं। पंजाब में हिंदू आबादी लगभग 38.5 प्रतिशत है। संख्या की दृष्टि से यह भले ही एक अल्पसंख्यक समूह लगे लेकिन चुनावी राजनीति में इसकी उपेक्षा असंभव है। इसका मुख्य कारण हिंदुओं की भौगोलिक बसावट है।
पंजाब में क्या है हिंदुओं की स्थिति?
पंजाब की कुल आबादी का लगबग 37.5% शहरों में रहता है, जबकि राज्य के लगभग 59% हिंदू मतदाता शहरों और कस्बों में रहते हैं। राज्य की 117 सीटों में से 34 विधानसभा सीटों पर हिंदू समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह है। लगभग 45 सीटें ऐसी हैं जहां हिंदू आबादी या तो स्पष्ट बहुमत में है या फिर हार-जीत का अंतिम फैसला करने की क्षमता रखती है। अगर कोई राजनीतिक दल ग्रामीण पंजाब में कमजोर भी प्रदर्शन करता है तब भी इन शहरी और हिंदू बहुल आंकड़ों के सहारे राज्य की सत्ता में मजबूती से बना रह सकता है।
किसी एक दल के साथ नहीं रहे हिंदू
पंजाब के ये शहरी मतदाता समय-समय पर अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलते रहे हैं। 1970 और 80 के दशक में उग्रवाद के दौर के दौरान शहरी व्यापारी और सरकारी कर्मचारी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहे। पंजाब में 1997 में शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भाजपा के बीच हुए गठबंधन ने दो दशकों तक काम का स्पष्ट विभाजन किया। अकाली दल ने ग्रामीण सिख वोटों को संभाला और भाजपा ने शहरी हिंदू वोटों को अपनी ताकत बनाया। साल 2020 में दोनों का गठबंधन टूट गया। इसके बाद पंजाब के ग्रामीण इलाकों में भाजपा की पकड़ ढीली पड़ गई। अकाली दल को शहरी हिंदू वोटरों का साथ गंवाना पड़ गया। अकाली और भाजपा गठबंधन टूटने का सीधा फायदा 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिला, जिसने माझा और मालवा दोनों क्षेत्रों के शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच भारी बढ़त हासिल की।
पंजाब की राजनीति में हिंदुओं को साइलेंटर वोटर के तौर पर देखा जाता है। ये अपना असंतोष जताने के लिए मतदान का ही सहारा लेते हैं। पिछले तीन दशकों के चुनावी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस वर्ग के 7 से 14 प्रतिशत वोट खिसकने मात्र से पंजाब की सत्ता का तख्तापलट हो जाता है। 2002–2007 में कांग्रेस को मिलने वाली हिंदू मतों की संख्या में 13.5 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। इसका असर यह हुआ कि वह सत्ता से बेदखल हो गई। 2012-17 में अकाली-भाजपा को मिलने वाले हिंदू मतों में 10.5 प्रतिशत की कमी आई। इसका असर यह हुआ कि 18 सीटों पर सिमटकर आ गई।
बंगाल ने बढ़ाई आप की चिंता
पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा ने हिंदू मतदाताओं का एकमुश्त ध्रुवीकरण करके अपनी पैठ बनाई, लेकिन पंजाब में यह मॉडल उस तरह काम नहीं कर पाया है। पंजाब का हिंदू समुदाय किसी एक प्रभुत्वशाली जाति या वर्ग में बंटा हुआ नहीं है। इसमें व्यापारी, उद्योगपति, पेशेवर और विभिन्न जाति समूह शामिल हैं। लंबे समय से राज्य की नीतियां और वित्तीय आवंटन कृषि-केंद्रित रहे हैं, जिससे शहरी व्यापारी और उद्योगपति उपेक्षित महसूस करते रहे हैं। वर्तमान में आम आदमी पार्टी का यह नया 'सनातनी' अवतार इसी असंतोष को साधने और भाजपा के बढ़ते वोट बैंक में सेंध लगाने की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है।















Leave a Reply