Betwa River Dries Up in MP-UP; 85 Check Dams Built for Revival


भोपाल से 25 किलोमीटर दूर झिरी में है बेतवा नदी का उद्गम स्थल।

मध्य प्रदेश की ‘गंगा’ कही जाने वाली बेतवा नदी सूख गई है। भोपाल से 25 किलोमीटर दूर बेतवा के उद्गम स्थल झिरी में गोमुख से पिछले 6 महीने से पानी नहीं आ रहा है। यही नदी एमपी और यूपी के 10 जिलों से गुजरकर यमुना और फिर गंगा में मिल जाती है।

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इस नदी को पुनर्जीवित करने के लिए अब अभियान शुरू हुआ है। बीते 7 दिन में भोपाल, इंदौर, रायसेन, विदिशा, राजगढ़ समेत कई जिलों के पर्यावरणविद्, वकील और स्टूडेंट्स ने श्रमदान करके 85 चेक डैम बना दिए, जबकि पिछले साल बने 55 चेक डैम को व्यवस्थित किया। यही चेक डैम बारिश का पानी रोकेंगे। ताकि, उद्गम स्थल लगातार प्रवाहित हो सके।

रिटायर्ड आयकर अधिकारी आरके पालीवाल के नेतृत्व में स्थानीय स्तर पर ‘ऑपरेशन चेक डैम’ और पौधरोपण की पहल की गई है। उनका कहना है कि किसी नदी का उद्गम लगातार दूसरे साल सूखना पूरे कैचमेंट सिस्टम के फेल होने का संकेत है। इसलिए बड़े स्तर पर इसे पुनर्जीवित करने की शुरुआत की है।

बेतवा के उद्गम स्थल की तस्वीरें…

गोमुख से पानी की धार निकलना अब बंद हो गई है।

गोमुख से पानी की धार निकलना अब बंद हो गई है।

बेतवा का उद्गम स्थल ग्राम झिरी में है।

बेतवा का उद्गम स्थल ग्राम झिरी में है।

8 फीट मलबे में दब गया था पार्वती कुंड

पालीवाल ने बताया कि नदी क्षेत्र के सबसे ऊंचे पार्वती कुंड को भी पुनर्जीवित किया है। यह करीब आठ फीट मलबे में दबकर पूरी तरह बंद हो चुका था। इस कुंड के पुनर्जीवित होने से इलाके के वन्यजीव प्यास बुझा रहे हैं।

उद्गम के पास खेत ही खेत, पहले घना जंगल था

लगातार दूसरे साल बेतवा का उद्गम स्थल सूखा है। रायसेन के झिरी गांव में स्थित यह प्राकृतिक भूजल स्रोत दो साल पहले तक सालभर बहता था। अब बारिश के कुछ महीनों बाद ही धारा गायब हो जाती है।

एक्सपर्ट की मानें तो झिरी और आसपास का इलाका कुछ साल पहले तक घना जंगल था, जो अब बड़े पैमाने पर खेती में बदल चुका है। इससे कैचमेंट क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा है।

अब देखिए श्रमदान की 2 तस्वीरें…

श्रमदान कर पार्वती कुंड को लोगों ने जीवित कर दिया।

श्रमदान कर पार्वती कुंड को लोगों ने जीवित कर दिया।

पार्वतीकुंड की सफाई करते लोग।

पार्वतीकुंड की सफाई करते लोग।

एक हजार एकड़ में हो रही धान की खेती

झिरी और इससे लगे बेहड़ा गांव सहित आसपास के क्षेत्र में करीब एक हजार एकड़ में गेहूं और धान की खेती होती है। खेती के लिए भूजल से सिंचाई की जाती है। पेयजल की जरूरतें भी इसी भूजल पर निर्भर हैं। इस बदलाव ने उस प्राकृतिक जल प्रणाली को सीधे प्रभावित किया है, जिस पर बेतवा का उद्गम निर्भर था।

गोमुखी के आसपास छोटे-छोटे कई प्राकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं। यही स्रोत और इस पूरे इलाके का भूजल गोमुखी तक पानी पहुंचाता था। स्थिति यह है कि इन स्रोतों को और गहरा कर उनमें मोटर पंप लगाए गए हैं।

इनका उपयोग ट्यूबवेल की तरह हो रहा है। जो भूजल पहले रिसकर उद्गम स्थल तक पहुंचता था, रास्ते में ही निकाल लिया जा रहा है। इसलिए दो साल में कुल 135 चेक डैम बनाए गए हैं। ताकि, जितना हो सके, उतना पानी रोका जाए।

बेतवा के पास भोपाल नगर निगम के फिल्टर प्लांट से आने वाला पानी।

बेतवा के पास भोपाल नगर निगम के फिल्टर प्लांट से आने वाला पानी।

पहले बेतवा की यात्रा की, फिर संवारने की कवायद

पूर्व आयकर अधिकारी पालीवाल ने बताया कि बेतवा नदी का न सिर्फ उद्गम स्थल, बल्कि आगे नदी भी सूख गई है। इसलिए फरवरी 2023 में देशभर के पर्यावरणविद् के साथ बेतवा की 200 किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली थी। इसमें देखा कि बेतवा के सूखने के क्या कारण है? क्योंकि ये पहले सालभर तक बहती थी। पुराणों में भी इसका जिक्र है।

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4 दिन की खुदाई… सूखी पहाड़ी पर फिर फूटा पानी

भोपाल के पास ग्राम झिरी स्थित बेतवा नदी के सूखे उद्गम स्थल को पुनर्जीवित करने के लिए 10 मई से शुरू हुए श्रमदान अभियान के चौथे दिन बुधवार को श्रमदानियों को पहाड़ी पर एक प्राचीन प्राकृतिक जलस्रोत मिला। इसे ‘पार्वती कुंड’ नाम दिया गया है। जैसे ही श्रमदानियों ने मिट्टी और पत्थर हटाकर कुंड की सफाई शुरू की, अंदर से पानी की झिर फूट पड़ी।

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