लखनऊ
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 और उसके बाद 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पूर्वांचल में अपनी दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि भाजपा पूर्वांचल में भूमिहार समाज के नए प्रभावशाली चेहरे की तलाश में है और इसी रणनीति के तहत पूर्व सांसद अतुल राय की भूमिका को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा अभी से 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि अगले तीन-चार वर्षों में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की सक्रिय चुनावी राजनीति में भूमिका सीमित हो सकती है। ऐसे में पूर्वांचल में भूमिहार समाज के बीच प्रभाव बनाए रखने के लिए नए नेतृत्व को तैयार करने की रणनीति बनाई जा रही है।
मनोज सिन्हा लंबे समय तक पूर्वांचल में भाजपा का बड़ा भूमिहार चेहरा रहे हैं। वर्ष 2014 में गाजीपुर लोकसभा सीट से जीतकर वे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में रेल राज्य मंत्री तथा बाद में दूरसंचार मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें गाजीपुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उनके राज्यसभा जाने की चर्चाएं भी चलीं, लेकिन पार्टी ने उन्हें जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल नियुक्त कर दिया।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि 2014 में गाजीपुर से सांसद बनकर मोदी सरकार में रेल राज्यमंत्री और दूरसंचार मंत्री रहे मनोज सिन्हा अगले 3-4 साल में 80 वर्ष के हो जाएंगे। 2019 में गाजीपुर से चुनाव हारने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजने की अटकलें भी चली थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि उपराज्यपाल बनने के बाद मनोज सिन्हा का अधिकांश समय जम्मू-कश्मीर में बीत रहा है, जिससे पूर्वांचल में उनका प्रत्यक्ष राजनीतिक संपर्क पहले की तुलना में कम हुआ है। पार्टी के भीतर यह भी महसूस किया जा रहा है कि इसका असर कई जिलों में संगठन पर पड़ा है। पिछले विधानसभा चुनाव में गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़ और वाराणसी जिले की कई सीटों पर भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। गाजीपुर जिले में तो पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मनोज सिन्हा के सक्रिय क्षेत्रीय संपर्क में कमी आने के बाद कांग्रेस ने भी पूर्वांचल की सामाजिक राजनीति को साधने की कोशिश की। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने भूमिहार नेता अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। अजय राय ने पूर्वांचल में लगातार सक्रिय रहकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत की और पार्टी के लिए इस वर्ग में आधार बढ़ाने का प्रयास किया।
इसी बीच बसपा के पूर्व सांसद अतुल राय की भाजपा नेताओं से बढ़ती निकटता राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। पार्टी सूत्रों का दावा है कि भाजपा और अतुल राय के बीच अंदरखाने बातचीत जारी है। हालांकि इस संबंध में किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा विधानसभा चुनाव 2027 में अतुल राय की राजनीतिक क्षमता का परीक्षण कर सकती है। पार्टी उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूर्वांचल की उन विधानसभा सीटों पर जिताने की जिम्मेदारी दे सकती है, जहां पिछले चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा फिलहाल ‘मैन-टू-मैन मार्किंग’ की रणनीति के तहत प्रत्येक कमजोर सीट के लिए प्रभावशाली स्थानीय चेहरों को जिम्मेदारी देने की योजना पर काम कर रही है।
भाजपा के एक नेता का कहना है कि घोसी से सांसद रह चुके अतुल राय ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपना राजनीतिक नेटवर्क बनाए रखा। वर्तमान में वे पूर्वांचल के कई जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इसके साथ-साथ बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों बक्सर, आरा, भोजपुर, चौसा समेत कई जिले में भी सक्रिय हैं। हाल ही में भोजपुर जिले में एनकाउंटर में मारे गए भारत तिवारी के घर उनका बड़े काफिले के साथ पहुंचना भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय रहा है।
अतुल राय के करीबी भी स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक स्तर पर “कुछ गतिविधियां चल रही हैं” और अगले एक-दो महीनों में पूर्वांचल की राजनीति में नए समीकरण सामने आ सकते हैं।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि यदि विधानसभा चुनाव में अतुल राय भाजपा की अपेक्षाओं के अनुरूप प्रदर्शन करने में सफल रहते हैं तो 2029 के लोकसभा चुनाव में उन्हें घोसी संसदीय सीट से भाजपा उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर रहे चंद्रकांत द्विवेदी पूर्वांचल की राजनीति को करीब से समझते हैं। उन्होंने कहा कि, “ मनोज सिन्हा का विकल्प भाजपा को इतनी जल्दी नहीं मिल सकता है। हाँ, जिस रणनीति की बात आप कर रहे हैं वो एक नई शुरुवात हो सकती है।”
श्री द्विवेदी ने कहा कि, अतुल राय बसपा के नेता हैं । पिछले कुछ चुनावों से बसपा के लिए काम कर रहे है। हाँ ये जरूर है कि अतुल राय की पकड़ अपने समुदाय के साथ ही पिछड़े और दलित समुदाय के बीच है जिसका फ़ायदा भाजपा को मिल सकता है।“
















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