नई दिल्ली
अमेरिका-ईरान युद्ध (US Vs Iran War) के चलते होर्मुज स्ट्रेट बंद (Hormuz Strait Closure) होने से गहराए तेल संकट का बुरा असर तमाम देशों में पड़ा है. भारत भी इससे अछूता नहीं है और देश में पेट्रोल-डीजल से लेकर एलपीजी तक की किल्लत देखने को मिली. हालांकि, मोदी सरकार ने तत्काल उठाए गए बड़े कदमों के जरिए इस संकट को कम करने का प्रयास किया।
ईरान युद्ध और ईंधन की ऊंची कीमत का असर भारतीय एविएशन सेक्टर की दिग्गज कंपनी एअर इंडिया (Air India) पर भी पड़ा है और उसे बड़ा फैसला लेना पड़ा है. इसके तहत एयरलाइंस अपनी घरेलू उड़ानों की संख्या में 22 फीसदी कटौती करेगी।
जून-जुलाई में पड़ेगा असर
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध की वजह से तेल के दाम में आए उछाल ने जेट फ्यूल महंगा किया है और इसने एयरलाइन कंपनियों का गणित बिगाड़ा है. इसकी वजह से एयरलाइन की वित्तीय स्थिति पर लगातार नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिसे देखते हुए एअर इंडिया ने अचानक जून और जुलाई के दौरान अपनी घरेलू उड़ानों में 22% की कटौती करने का फैसला किया है।
Air India ने ये फैसला ऐसे समय में लिया है, जबकि वेस्ट एशिया टेंशन के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजारों में रुकावट जारी है और एविएशन सेक्टर को लागत में भारी बढ़ोतरी से जूझना पड़ रहा है. जून-जुलाई के लिए कंपनी ने फैसला ले लिया है, जबकि अगस्त के लिए अभी बाकी है।
ईंधन की आसमान छूती कीमतें और वित्तीय दबाव
एयर इंडिया के अधिकारियों के अनुसार, ईरान संघर्ष से पहले विमान ईंधन की कीमत लगभग ₹80,000 प्रति किलोलीटर थी, जो अब बढ़कर ₹1 लाख प्रति किलोलीटर से अधिक हो चुकी है. वर्तमान में एयरलाइन के कुल परिचालन खर्च का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा अकेले ईंधन पर खर्च होता है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में कंपनी को ₹26,800 करोड़ का शुद्ध घाटा हुआ है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 गुना अधिक है. ऐसे में इन रूटों पर उड़ानों का संचालन जारी रखना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं रह गया था।
उड़ानों के फेरों में युक्तिसंगत कमी
एयर इंडिया वर्तमान में प्रति सप्ताह कुल 4,400 उड़ानों का संचालन करता है, जिसमें लगभग 3,600 घरेलू और 800 अंतरराष्ट्रीय सेवाएं शामिल हैं. 22 प्रतिशत की इस अस्थायी कटौती से प्रति सप्ताह लगभग 720 घरेलू उड़ानें प्रभावित होंगी. कंपनी ने स्पष्ट किया है कि किसी भी रूट को पूरी तरह बंद नहीं किया जा रहा है, बल्कि चुनिंदा घरेलू मार्गों पर केवल उड़ानों के फेरे कम किए जा रहे हैं।
कनेक्टिंग फ्लाइट्स की मांग में गिरावट
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में की गई कटौती का सीधा असर घरेलू उड़ानों पर भी पड़ा है. विदेश से आने वाले यात्रियों की संख्या घटने के कारण दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े विमानन केंद्रों के लिए कनेक्टिंग घरेलू उड़ानों की मांग में भारी कमी आई है. मांग का यह असंतुलन भी उड़ानों को युक्तिसंगत बनाने का एक मुख्य कारण बना है।
प्रभावित यात्रियों के लिए राहत के उपाय
विमानन कंपनी ने यात्रियों को आश्वस्त किया है कि स्थिति सामान्य होते ही उड़ानों को पूर्ववत कर दिया जाएगा. इस दौरान प्रभावित होने वाले यात्रियों को निम्नलिखित सुविधाएं दी जाएंगी:
वैकल्पिक उड़ान: यात्रियों को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के दूसरी उपलब्ध उड़ानों में सीट दी जाएगी.
तारीख में मुफ्त बदलाव: यात्रा की तिथि बदलने पर कोई पेनल्टी या चेंज फीस नहीं ली जाएगी.
पूर्ण रिफंड: विकल्प पसंद न आने पर यात्री अपनी टिकट का पूरा पैसा वापस ले सकते हैं.
एअर इंडिया ने दिया ये बयान
एअर इंडिया की ओर से पुष्टि करते हुए एयरलाइन के प्रवक्ता ने कहा है कि जेट फ्यूल प्राइस में उछाल के परिचालन पर दबाव जारी है, इसे देखते हुए उड़ानों में कटौती का कदम उठाना पड़ रहा है, लेकिन स्थितियों के स्थिर होते ही उड़ानों की संख्या बहाल की जा सकती है. इससे घरेलू उड़ानों में करीब 10% तक कटौती हो सकती है।
न सिर्फ एअर इंडिया, बल्कि रिपोर्ट्स की मानें, तो भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo भी जून और अगस्त के बीच घरेलू उड़ानों में 7% तक कटौती कर सकती है. हालांकि, इंडिगो ने इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया जारी नहीं की है।
ऊंचे रह सकते हैं टिकट के दाम
Iran War के चलते बीते कुछ महीनों में वैश्विक स्तर पर जेट फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और ये एयरलाइंस के सबसे बड़े खर्चों में से एक है, जो आमतौर पर परिचालन लागत का लगभग एक चौथाई होता है।
इसकी कीमत बढ़ने से लागत पर खर्च में इजाफा हुआ है और वैश्विक स्तर पर एयरलाइनों को टिकटों की कीमतें बढ़ाने, घाटे वाले रूट्स को बंद करने और उड़ानों की संख्या कम करने के लिए मजबूर हो पड़ा है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर Jet Fuel की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो घरेलू हवाई किराया भी ऊंचा रह सकता है. इसके पीछे वजह ये है कि भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव से सीधे एयरलाइंस भी प्रभावित होती हैं।
मौसमी मंदी और भविष्य की रणनीति
स्कूल की छुट्टियां खत्म होने के बाद आमतौर पर हवाई यात्रा में कमी आती है। इसे मौसमी मंदी कहा जाता है। इस अवधि में यात्रियों की संख्या घट जाती है, जिससे एयरलाइंस को नुकसान होता है। क्षमता में कटौती करके एयरलाइंस अपनी लागत कम करना चाहती हैं। यह कदम उन्हें वित्तीय दबाव से निपटने में मदद करेगा। एअर इंडिया और इंडिगो दोनों ही इस अवधि में अपनी सेवाओं को अनुकूलित कर रही हैं।









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