GST केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कंपनी को आरोपी बनाए बिना निदेशक पर नहीं चलेगा मुकदमा

चंडीगढ़
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जीएसटी से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी पर कर अपराध का आरोप होने की स्थिति में केवल निदेशक को आरोपित बनाकर उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

संबंधित कंपनी को भी मामले में आरोपित बनाना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी के खिलाफ अभियोजन के बिना निदेशक पर केवल ‘प्रतिनिधिक जिम्मेदारी’ के आधार पर आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती।

जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने यह टिप्पणी कंपनी के निदेशक मनोज बंसल की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने रोहतक के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित शिकायत और उससे जुड़ी आगे की पूरी कार्यवाही को रद कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने जीएसटी विभाग को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है।

मामले के अनुसार, जीएसटी खुफिया महानिदेशालय (डीजीजीआइ) गुरुग्राम की क्षेत्रीय इकाई को सूचना मिली थी कि संबंधित कंपनी कथित तौर पर गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ ले रही है। सूचना के आधार पर कंपनी के पंजीकृत परिसर में तलाशी ली गई। जांच के दौरान खरीद से संबंधित बिल और परिवहन से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए।

विभाग के अनुसार, जांच में सामने आया कि कंपनी ने ऐसी कई फर्जी या कागजी कंपनियों का इस्तेमाल किया, जिन्होंने सामान की वास्तविक आपूर्ति किए बिना बिल जारी किए थे। जांच में ऐसी 31 संस्थाओं का उल्लेख किया गया। आरोप था कि कंपनी के निदेशक मनोज बंसल खुले बाजार से बिना बिल के नकद में लेड धातु खरीदते थे और वास्तविक खरीद के बजाय इन कथित फर्जी कंपनियों से बिल हासिल कर इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ लेते थे।

विभाग के अनुसार, इस तरीके से कंपनी ने करीब 15.44 करोड़ रुपये का गलत इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल किया। जीएसटी खुफिया विभाग ने हाईकोर्ट में मनोज बंसल की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि वह केवल कंपनी के नाममात्र निदेशक नहीं थे, बल्कि कंपनी के कामकाज और जीएसटी से जुड़े मामलों में सक्रिय रूप से शामिल थे। विभाग ने उन्हें कथित लेनदेन का लाभार्थी और मुख्य कर्ताधर्ता भी बताया।

हाईकोर्ट ने इस तथ्य को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना कि विभाग स्वयं यह स्वीकार कर रहा था कि कथित तौर पर 15.44 करोड़ रुपये का गलत इनपुट टैक्स क्रेडिट कंपनी ने लिया था। कंपनी को जीएसटी अधिनियम की धारा 74 के तहत कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। इसके बाद 16 जनवरी 2025 को पारित आदेश के खिलाफ कंपनी ने धारा 107 के तहत अपील भी दाखिल की थी।

अदालत ने कहा कि कर संबंधी कार्यवाही कंपनी के खिलाफ चल रही है। ऐसे में जब कथित अपराध कंपनी ने किया है और कंपनी को आपराधिक मामले में आरोपित ही नहीं बनाया गया, तो उसके निदेशक के खिलाफ प्रतिनिधिक जिम्मेदारी के आधार पर अभियोजन नहीं चलाया जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मनोज बंसल के खिलाफ लंबित शिकायत और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही रद कर दी।

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