दिल्ली दंगों के हेट स्पीच केस में बड़ा फैसला, हाईकोर्ट ने 15 याचिकाएं कीं खारिज

नई दिल्ली

दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों और दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई हिंसा से जुड़ी याचिकाओं के पूरे समूह को खारिज कर दिया है। इन याचिकाओं में नेताओं के खिलाफ कथित नफरती भाषण (Hate Speech) के लिए FIR दर्ज करने, स्वतंत्र एसआईटी (SIT) का गठन करने और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की गई थी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित हेट स्पीच मामले में कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने और SIT जांच की मांग वाली सभी 15 याचिकाएं खारिज कर दीं. जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने इन याचिकाओं पर फैसला सुनाया. ये सभी याचिकाएं दंगों के बाद 2020 में दाखिल की गई थीं। 

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि CAA और NRC के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान कुछ राजनीतिक नेताओं के भाषणों ने हिंसा भड़काने में भूमिका निभाई. याचिकाओं में नेताओं के साथ-साथ उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई थी, जिन पर ड्यूटी में लापरवाही का आरोप लगाया गया था। 

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने फैसला सुनाते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं के समूह को दो हिस्सों में बांटा गया था – एक उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से संबंधित और दूसरा जामिया मिलिया हिंसा से संबंधित। बेंच ने कहा, "फैसले में बताई गई वजहों से, सभी याचिकाएं खारिज की जाती हैं।"

कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर समेत कई नेताओं के खिलाफ FIR की मांग
शेख मुजतबा की एक याचिका में BJP नेताओं कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और अभय वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी. याचिका में आरोप लगाया गया कि इन नेताओं के भाषणों ने 2020 के दंगों के दौरान हिंसा में योगदान दिया। 

याचिका में अनुराग ठाकुर के एक भाषण का भी जिक्र था, जिसमें उन पर CAA विरोधी प्रदर्शनकारियों को लेकर ‘देश के गद्दारों को गोली मारो’ नारे का नेतृत्व करने का आरोप लगाया गया था. वहीं, परवेश वर्मा पर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को लेकर भड़काऊ बयान देने का आरोप लगाया गया था। 

एक अन्य याचिका में कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा, AAP नेताओं मनीष सिसोदिया और अमानतुल्लाह खान, AIMIM प्रमुख अकबरुद्दीन ओवैसी और पूर्व विधायक वारिस पठान के खिलाफ भी FIR की मांग की गई थी। 

पुलिस कार्रवाई और NIA जांच की भी मांग
CPI(M) नेता बृंदा करात की याचिका में पुलिस, RAF और दूसरे सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कथित गलत आचरण और लापरवाही की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी. वहीं, एक अन्य याचिका में CAA विरोधी प्रदर्शनों की कथित फंडिंग और समर्थन की जांच NIA से कराने की मांग की गई थी। 

24 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में CAA और NRC के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई थी. इसमें कम से कम 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि करीब 700 लोग घायल हुए थे. हिंसा के दौरान आगजनी और तोड़फोड़ की कई घटनाएं सामने आई थीं। 

याचिकाओं में नेताओं के खिलाफ कथित हेट स्पीच के लिए FIR की मांग की गई थी

उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से संबंधित याचिकाओं में राजनीतिक नेताओं के खिलाफ हिंसा के संबंध में कथित हेट स्पीच के लिए FIR दर्ज करने के निर्देश देने की मांग भी शामिल थी।

याचिकाओं में दंगों की जांच के लिए SIT, जांच आयोग या फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाने की भी मांग की गई थी। कुछ याचिकाओं में हिंसा में शामिल होने के आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ प्रभावित लोगों के इलाज और मुआवजे से संबंधित निर्देश देने की भी मांग की गई थी।

इसलिए, राजनीतिक नेताओं के खिलाफ FIR की मांग करने वाली याचिकाएं 2020 के दंगों से संबंधित याचिकाओं के व्यापक समूह का हिस्सा थीं। हालांकि, हाई कोर्ट ने सोमवार को याचिकाओं के इस समूह को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला 24 जुलाई को सुरक्षित रख लिया था। खारिज करने की वजहों को बताने वाले विस्तृत आदेश का इंतजार है।
2020 के दिल्ली दंगों के दौरान क्या हुआ था?
नागरिकता कानून के विरोध के बीच 24 फरवरी, 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक झड़पें हुईं। कोर्ट के सामने पेश की गई जानकारी के अनुसार, हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हुई और लगभग 700 लोग घायल हुए। दंगों से संबंधित याचिकाओं में हिंसा की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी, जिसमें SIT, जांच आयोग या फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी के माध्यम से जांच शामिल थी। कुछ याचिकाकर्ताओं ने उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ FIR दर्ज करने की भी मांग की, जिन पर हिंसा के दौरान गलत काम करने का आरोप था। याचिकाओं में दंगों से प्रभावित लोगों के इलाज और मुआवज़े से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए।

जामिया हिंसा से जुड़ी अलग-अलग याचिकाएं
दिल्ली हाई कोर्ट के सामने याचिकाओं का दूसरा सेट उस हिंसा से जुड़ा था जो दिसंबर 2019 में CAA के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शनों के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई थी।

याचिकाकर्ताओं ने पुलिसकर्मियों द्वारा छात्रों के साथ की गई कथित बर्बरता की जांच के लिए एक ऐसी SIT की मांग की थी जो पुलिस और केंद्र सरकार से स्वतंत्र हो। सोमवार को अपना फ़ैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने मामलों के इन दोनों सेटों पर अलग-अलग सुनवाई की। बेंच ने कहा, "इस मामले के समूह को दो हिस्सों में बांटा गया है: एक उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के लिए और दूसरा जामिया मिलिया दंगों के लिए।"

अब जब याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं, तो उम्मीद है कि विस्तृत फ़ैसले में कोर्ट के इस निर्णय के पीछे के कारण बताए जाएंगे।

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