नई दिल्ली
डिजिटल युग में बचपन धीरे-धीरे चार दीवारों और मोबाइल स्क्रीन के पीछे सिमटता जा रहा है. बच्चों की शारीरिक गतिविधियों में आती इस भारी गिरावट पर अब देश की सर्वोच्च अदालत ने भी बेहद गंभीर चिंता जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि आज के दौर में बच्चे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और स्मार्टफोन में इस कदर व्यस्त हैं कि उनका मैदानी खेल-कूद लगभग खत्म हो गया है, जबकि सर्वांगीण विकास के लिए यह बेहद जरूरी है।
यह पूरी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में स्पोर्ट्स को मौलिक अधिकार घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान आई।
क्या खेल-कूद बनेगा संविधान का 'मौलिक अधिकार'?
यह याचिका 'स्पोर्ट्स अ वे ऑफ लाइफ' एनजीओ के अध्यक्ष और खेल शोधकर्ता डॉ. कनिष्का पांडे द्वारा दाखिल की गई है. इसमें मुख्य मांग ये है कि भारतीय संविधान के भाग-3 (अनुच्छेद 21A) के तहत खेलों को भी शिक्षा की तरह बच्चों का 'मौलिक अधिकार' घोषित किया जाए।
साथ ही ये मांग भी की गई है कि केंद्र और राज्य सरकारें पढ़ाई और खेल में कोई भेदभाव न करें. नर्सरी से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएशन (PG) स्तर तक खेलों को स्कूल और कॉलेज के अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए. हर स्कूल के वार्षिक बजट में से एक निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से खेलकूद के बुनियादी ढांचे और सामान के लिए आवंटित हो।
इसके तहत सभी नए फोन में एक अलग माइनर मोड देना अनिवार्य किया जा सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक माता-पिता इस मोड के जरिए कई तरह के नियंत्रण कर सकेंगे। इसमें एप डाउनलोड पर रोक लगाना, रोजाना स्क्रीन टाइम तय करना और देर रात फोन या सोशल मीडिया के इस्तेमाल को बंद करा शामिल होगा।
इसके ही साथ ही हानिकारक सामग्री को फिल्टर करने और बच्चे की उम्र के अनुसार एप तक पहुंच देने का विकल्प भी दिया जा सकता है।
सरकार का मकसद है कि मोबाइल कंपनियां और एप डेवलपर फोन बनाते समय ही बच्चों की सुरक्षा से जुड़े फीचर जोड़ें, ताकि बाद में अलग से कोई सेटिंग करने की जरूरत न पड़े। हालांकि, अधिकारियों ने साफ किया है कि इस मोड में पढ़ाई से जुड़े एप और आपातकालीन संपर्क की सुविधाएं बंद नहीं की जाएंगी।
अमाइकस क्यूरी का बड़ा सुझाव
मामले में अदालत द्वारा नियुक्त किए गए न्याय मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी सिफारिशें सौंपीं:
कम से कम 90 मिनट का खेल: CBSE, ICSE और सभी राज्य शिक्षा बोर्डों को अपने डेली टाइम-टेबल में कम से कम 90 मिनट का समय 'फ्री प्ले और गेम्स' के लिए आरक्षित (Compulsory Block) करना चाहिए।
स्क्रीन टाइम पर रोक: अगर बच्चों को समय रहते मैदानों से नहीं जोड़ा गया, तो उनका अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन पर ही बीतेगा, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
कोर्ट का अगला कदम: 22 सितंबर को अगली सुनवाई
इससे पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मुद्दे पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था. ताजा सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने अमाइकस क्यूरी (न्याय मित्र) की रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी, जहां केंद्र सरकार और शिक्षा बोर्ड्स के रुख पर बड़ा फैसला आ सकता है।
















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