झारखंड के पूर्व मंत्री माधव लाल सिंह का निधन:गोमिया से चार बार विधायक रहे, रांची के पल्स अस्पताल में ली अंतिम सांस




झारखंड के पूर्व मंत्री और गोमिया विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ नेता माधव लाल सिंह का बुधवार सुबह निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें बोकारो के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां से गंभीर हालत में रांची रेफर किया गया। रांची के पल्स अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही गोमिया समेत पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। समर्थकों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। चार बार विधायक रहे, जननेता के रूप में बनाई पहचान माधव लाल सिंह गोमिया विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक चुने गए थे। उन्होंने अविभाजित बिहार और बाद में झारखंड सरकार में मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। लंबे समय तक वे क्षेत्रीय राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। उनकी पहचान एक ईमानदार और जमीनी जननेता के रूप में थी, जो हमेशा जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देते थे। उन्होंने विकास कार्यों के साथ-साथ जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाई और लोगों के बीच मजबूत पकड़ बनाए रखी। दशकों तक राजनीति में रहा प्रभाव गोमिया विधानसभा क्षेत्र की राजनीति पर उनका प्रभाव कई दशकों तक कायम रहा। वर्ष 1977 से 2014 तक गोमिया की राजनीति मुख्य रूप से माधव लाल सिंह और छत्रुराम महतो के इर्द-गिर्द घूमती रही। इस दौरान उन्होंने कई स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन का नेतृत्व किया और जनता की आवाज को मजबूती से उठाया। उनके निधन को झारखंड की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। क्षेत्र के लोगों के बीच वे एक सहज, सुलभ और संघर्षशील नेता के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे। निर्दलीय चुनाव लड़ दिखाई माधो लहर गोमिया विधानसभा की राजनीति में वर्ष 1977 से 2014 तक मुख्य रूप से दो नेताओं, माधव लाल सिंह और छत्रुराम महतो का दबदबा रहा। माधव लाल सिंह ने 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर “माधो लहर” के साथ अपनी पहचान बनाई और दिग्गज नेताओं को हराकर राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने कई बार निर्दलीय और विभिन्न दलों के टिकट पर चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता साबित की। वर्ष 2000 में जीत के बाद वे अविभाजित बिहार में पर्यटन मंत्री बने और बाद में झारखंड में परिवहन मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि राजनीतिक जीवन में उन्हें हार का सामना भी करना पड़ा, लेकिन जनसंघर्ष और आम जनता से जुड़े मुद्दों के कारण उनकी लोकप्रियता कायम रही। उनकी सादगी और जमीनी जुड़ाव ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रही, जिसने उन्हें दशकों तक गोमिया की राजनीति का केंद्रीय चेहरा बनाए रखा।



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