खून की कमी दूर करने:ब्रेस्ट कैंसर को मात देने वाले ‘संजीवनी’ की खेती, महासमुंद में किसान कर रहे अनोखे धान की खेती, कई राज्यों में डिमांड




महासमुंद जिले के कौंदकेरा गांव में एक किसान औषधीय गुणों से भरपूर संजीवनी धान की खेती कर रहे हैं। किसान योगेश्वर चंद्राकर द्वारा उगाई जा रही धान की यह किस्म बेहद खास है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धान की एकमात्र ऐसी किस्म है, जो ब्रेस्ट कैंसर से बचाने में मददगार है। इसके अलावा यह विशिष्ट चावल शुगर से बचाव और शरीर में खून बढ़ाने के लिए भी अत्यधिक उपयोगी माना गया है। किसान योगेश्वर इस पूरी फसल की जैविक खेती करते हैं, ताकि इसके औषधीय गुण बरकरार रहें और लोगों को इसके बेहतर परिणाम मिल सकें। योगेश्वर बताते हैं कि वर्तमान में वे अपनी एक एकड़ जमीन पर संजीवनी धान की खेती कर रहे हैं। यह मुख्य रूप से खरीफ के मौसम की फसल है। इसकी बोनी के लिए एक एकड़ में लगभग 20-30 किलो धान के बीज की जरूरत होती है। सामान्य धान की तुलना में इस किस्म की फसल को पूरी तरह पककर तैयार होने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है। यह फसल लगभग 145 दिनों में तैयार होती है। खेत में किसी भी तरह की रासायनिक दवा या खाद डालने से इस चावल की प्राकृतिक गुणवत्ता और औषधीय क्षमता कम हो जाती है। फसल को रसायनों से बचाने के लिए योगेश्वर इसमें केवल जैविक खाद का ही इस्तेमाल करते हैं। इस खेती के लिए सड़े-गले पत्ते और केंचुवा खाद सबसे उत्तम रहते हैं। योगेश्वर फसल में रासायनिक कीटनाशकों की बजाए पूरी तरह गोमूत्र, नीमास्त्र, छाछ और पंचगव्य का उपयोग करते हैं, जो कीटनाशक के तौर पर पौधों की सुरक्षा करते हैं। संजीवनी धान का पौधा सामान्य से काफी बड़ा यानी करीब 6 फीट तक ऊंचा होता है। पौधे अधिक बड़े होने के कारण तेज आंधी-तूफान आने पर फसल के गिरने की संभावना बनी रहती है। इस नुकसान से बचाव के लिए वे खेत में बांस या लोहे की डंडियों का सहारा देते हैं, जो पौधों को सीधा खड़ा रखती हैं। इस अनोखे धान की मांग देश के बड़े राज्यों में बहुत ज्यादा है। सामान्य धान की तुलना में संजीवनी धान में 231 अतिरिक्त फाइटोकेमिकल्स मिलते हैं, जिसमें से सात मेटाबोलाइट सीधे तौर पर मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। इसकी ज्यादा डिमांड के कारण भोपाल, दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों से लोग इसे एडवांस में ही बुक कर लेते हैं। इस धान की सबसे खास बात यह है कि इसकी सामान्य कुटाई या मिलिंग मशीनों में नहीं की जाती है। इसका चावल निकालने के लिए हाथ से ही इसका छिलका अलग करना पड़ता है। इस चावल को सामान्य भोजन या भात की तरह पकाकर नहीं खाया जाता, बल्कि इसे कच्चा ही भिगोकर दवा के रूप में इस्तेमाल करना होता है। योगेश्वर के मुताबिक, तीन चम्मच चावल को एक कटोरी पानी में भिगोकर रातभर के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद सुबह और शाम को दो समय इसका सेवन करना होता है। रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने ही योगेश्वर को इस संजीवनी राइस की खेती करने की सलाह और तकनीकी मार्गदर्शन दिया था। संजीवनी धान की उपयोगिता को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर भी बड़े शोध हुए हैं। भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र मुंबई में इस संजीवनी धान के चावल का चूहों पर बाकायदा वैज्ञानिक परीक्षण किया गया था, जिसके बेहद सकारात्मक और बेहतर परिणाम मिले। विशेष तौर पर स्तन कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करने और इसके इलाज में यह चावल पूरी तरह कारगर सिद्ध हुआ है। हमारे दैनिक खान-पान में सुपरफूड और औषधि से भरपूर इस संजीवनी चावल का उपयोग आने वाले समय में चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ा मददगार जरिया बन सकता है। इन प्रगतिशील किसान से और जानें…
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