प्रेमानंद महाराज के स्वास्थ्य होने के लिए काशी में पूजन:भक्तों ने किया महामृत्युंजय मंत्र का जप,नियमित रात्रि पदयात्रा को अनिश्चितकाल के लिए किया गया स्थगित




मथुरा-वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उनके सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में बदलाव किया गया है। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से महाराजजी ने अपनी नियमित रात्रि पदयात्रा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया है। साथ ही, उनके एकांतिक दर्शन भी अगले आदेश तक बंद कर दिए गए हैं। इस खबर के सामने आने के बाद देशभर में उनके भक्तों के बीच चिंता और भावुकता का माहौल है। खासतौर पर काशी में भक्तों ने महाराजजी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया। मंदिरों में भजन-कीर्तन और महामृत्युंजय जाप भी कराया गया। भक्तों का कहना है कि महाराजजी ने लाखों लोगों को भक्ति, सेवा और सनातन संस्कृति से जोड़ा है। ऐसे में उनकी अस्वस्थता की खबर से श्रद्धालु भावुक हो उठे हैं और लगातार उनके जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे हैं। कौन हैं प्रेमानंद महाराज? 13 साल की उम्र में छोड़ा घर, फिर बने संत प्रेमानंद महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में हुआ था। उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। उनके पिता का नाम शंभू नारायण पांडे और माता का नाम रामा देवी है। परिवार में तीन भाई हैं और अनिरुद्ध मंझले पुत्र थे। बताया जाता है कि बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्म की ओर था। उन्होंने केवल कक्षा 8 तक ही पढ़ाई की, लेकिन धार्मिक प्रवृत्ति और भक्ति भावना ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही सामान्य जीवन से अलग कर दिया। शिव मंदिर के चबूतरे से बदली जिंदगी गांव में अपने मित्रों के साथ मिलकर अनिरुद्ध ने एक शिव मंदिर के लिए चबूतरा बनवाने की पहल की थी। निर्माण कार्य शुरू भी हो गया था, लेकिन कुछ लोगों के विरोध के कारण इसे रोक दिया गया। इस घटना ने बालक अनिरुद्ध के मन पर गहरा प्रभाव डाला। वह बेहद निराश हो गए और अंततः घर छोड़ने का निर्णय ले लिया। इसके बाद वह कानपुर से होते हुए काशी पहुंच गए। काशी से वृंदावन तक का आध्यात्मिक सफर जब अनिरुद्ध 13 वर्ष के हुए, तब उन्होंने ब्रह्मचर्य जीवन अपनाने का निर्णय लिया। शुरुआती दिनों में उनका नाम “आरयन ब्रह्मचारी” रखा गया। काशी में उन्होंने लगभग 15 महीने बिताए और वहां संतों के सान्निध्य में आध्यात्मिक साधना की। इसी दौरान उन्हें गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा प्राप्त हुई। गुरु की शिक्षा और भक्ति मार्गदर्शन के बाद उनका झुकाव राधा-कृष्ण भक्ति की ओर और गहरा हो गया। बाद में वह मथुरा-वृंदावन आ गए, जहां उन्होंने भक्ति, कथा और साधना के माध्यम से लाखों लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई।



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