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एक ओर सरकार ‘हर घर नल से शुद्ध पेयजल’ पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं कटनी जिले के रीठी विकासखंड का आदिवासी बहुल खुसरा गांव आज भी पानी की बूंद-बूंद के लिए संघर्ष कर रहा है। देश की आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी यहां के ग्रामीणों को स्थायी पेयजल समाधान नहीं मिल पाया है। जंगल और पहाड़ों के बीच बसे इस गांव के लोग वर्षों तक 500 मीटर गहरी खाई में उतरकर, चट्टानों से रिसने वाले पानी से अपनी प्यास बुझाने को मजबूर थे। यह स्थिति प्रशासनिक उदासीनता का स्पष्ट उदाहरण है। खुसरा गांव की कुल आबादी लगभग 238 है। वर्तमान में ग्रामीणों की पेयजल समस्या को देखते हुए ग्राम पंचायत ने एक अस्थायी व्यवस्था की है। गांव में दो हजार लीटर क्षमता की एक प्लास्टिक की टंकी रखवाई गई है। करीब डेढ़ किलोमीटर दूर कराए गए एक नलकूप (बोरिंग) से पाइपलाइन के जरिए इस टंकी तक पानी पहुंचाया जा रहा है। राहत के नाम पर इस टंकी में दो टोटियां लगाई गई हैं, जहां सुबह से ही ग्रामीणों की लंबी कतारें लग जाती हैं। ग्रामीण इन टोटियों से पानी भरकर साइकिलों, मोटरसाइकिलों और सिर पर ढोकर अपने घरों तक ले जा रहे हैं। हालांकि, स्थानीय पंचायत द्वारा की गई यह व्यवस्था अस्थायी है। ग्रामीणों को जिस स्थायी समाधान की दरकार थी, वह आज भी अधूरा है, जिससे जल जीवन मिशन के दावों पर सवाल उठ रहे हैं। यह स्थिति तब है जब 4 माह पहले गांव में पाइपलाइन बिछाई गई थी, लेकिन वह स्थायी पेयजल उपलब्ध कराने में विफल रही है।
खाई का डर तो मिटा, पर कम नहीं हुई महिलाओं-बच्चों की मजबूरी
ग्रामीणों के मुताबिक, पंचायत द्वारा प्लास्टिक की टंकी रखवा देने से कम से कम अब उस जानलेवा गहरी खाई में उतरने की मजबूरी कुछ हद तक खत्म जरूर हुई है, लेकिन यह व्यवस्था बेहद सीमित है। गांव में नियमित और पर्याप्त जल आपूर्ति नहीं होने के कारण चिलचिलाती धूप में महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक प्रताड़ित होना पड़ रहा है।
ग्रामीणों की जुबानी, दर्द और आक्रोश
स्थानीय निवासी सुमेर सिंह ने बताया कि पहले हमें पानी के लिए 500 मीटर गहरी खाई में उतरना पड़ता था। चट्टानों से रिसने वाले पानी को बूंद-बूंद इकट्ठा कर किसी तरह प्यास बुझाते थे। अब पंचायत ने टंकी रखवा दी है तो थोड़ी राहत है, लेकिन घर-घर तक पानी पहुंचने का सपना अभी भी अधूरा है। गर्मी में हमारी महिलाओं और बच्चों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है। जमीनी हकीकत कुछ ओर ही है गुज्जी सिंह ने बताया कि जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन डाले चार महीने से ज्यादा का समय हो गया, लेकिन टंकी का निर्माण आज भी अधूरा है। अधिकारी सिर्फ कागजों में काम की प्रगति दिखाकर वाहवाही लूट रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि हमें आज भी सिर और वाहनों पर पानी ढोना पड़ रहा है। प्रशासन को तुरंत इस पर संज्ञान लेकर स्थायी व्यवस्था करनी चाहिए। ठेकेदार ने मुख्य टंकी का निर्माण नहीं किया ग्राम पंचायत खुसरा के सचिव पुष्पेंद्र मिश्रा ने बताया कि यह सच है कि ग्रामीण अब पानी के लिए खाई में नहीं जाते। पंचायत द्वारा 2 हजार लीटर क्षमता की अस्थायी टंकी रखवाकर नलकूप से पानी भरा जा रहा है, जिससे ग्रामीणों को बड़ी राहत मिली है। गांव में 4 माह पहले पाइपलाइन डल चुकी है, लेकिन संबंधित ठेकेदार द्वारा मुख्य टंकी का निर्माण समय पर पूरा नहीं किया गया, जिसके कारण घर-घर तक नल का पानी नहीं पहुंच पा रहा है।
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कटनी में जल जीवन मिशन के दावे फेल:खुसरा गांव में 7 दशक बाद भी बूंद-बूंद पानी को तरस रहे ग्रामीण















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