25 हैंडपंप सूखे, 100 बोर बंद…:रीवा वालों को सता रहा डर, दूसरे गांवों ने पानी देना बंद किया तो क्या होगा? कई गांवों में ऐसे हालात




‘खुद देख लो! कितना कम पानी आ रहा है। एक डिब्बा भरने में 10-15 मिनट लग रहा है। थोड़ी देर में ये भी बंद हो जाएगा। जिसको पानी मिल गया , उसका तो काम चल जाएगा। बाकी लोगों को कल का इंतजार करना पड़ेगा। यहां पानी लेने के लिए दो-तीन दिन में नंबर आता है।’ सरिता साहू जब बोल रही हैं तो दाएं हाथ से पीले रंग के डिब्बों को भी दिखा रही हैं। ये डिब्बे पानी के इंतजार में कल से यहां रखे हैं। आज भी इनको पानी नहीं मिल पाएगा। सरिता की बात अभी पूरी भी नहीं हुई है कि पास में खड़ी मधु चंद्राकर बोलने लगीं , ‘इतने बर्तन-डिब्बे देखकर चौंको मत। कभी रात में आना, फिर देखना यहां कितने बर्तन और कितने लोग पानी के इंतजार में खड़े रहते हैं। गिन नहीं पाओगे। रात में 12:00 बजे से ही डिब्बे खड़खड़ाने लगते हैं। यह हाल है रीवा गांव का। यह गांव राजधानी रायपुर से 26-27 किलोमीटर दूर है और महानदी के किनारे बसा है। गांव में करीब 9000 लोग रहते हैं। घरों में 100 से ज्यादा बोर और 25 सार्वजनिक हैंडपंप हैं। लेकिन सब सूख चुके हैं। एक मात्र बोर से थोड़ा बहुत पानी आ रहा है। यह भी सौर ऊर्जा से चलता है। इसलिए दिन में ही चलेगा। अभी पतली धार निकल रही है जिसके चारों तरफ महिलाएं खड़ी हैं। इनके पीछे ढ़ाई सौ से ज्यादा पीले रंग के खाली डिब्बे हैं। जिनको आभास हो चला है कि आज उनकी बारी नहीं आएगी वे बर्तन छोड़कर चले गए हैं। कोई डिब्बा इधर-उधर ना हो जाए, इसलिए रस्सियों से बांध दिया है। यहां कोई एक बोतल पानी ज्यादा नहीं ले सकता। एक महिला ने ऐसा करने का दुस्साहस किया तो अन्य महिलाओं ने झिड़क कर हटा दिया। पूरा गांव दूर -दूर से पानी की व्यवस्था करने में व्यस्त है। अगर बच्चा है तो उसकी साइकिल में दो पीले डिब्बे लटक रहे हैं। या तो वह कहीं से पानी ला रहा है या पानी लाने जा रहा है। किसी आदमी की साइकिल में चार पीपे लटके हैं तो किसी में छह। कोई मोटरसाइकिल से पीपा लटका कर पानी लाने जा रहा है तो कोई लेकर आ रहा है। लड़कियां-महिलाएं भी साइकिल-स्कूटी से पानी ढोने में लगी हैं। बोर के पास महिलाओं से बात करते देखा हरसू साहू रुक गए। कहने लगे- मेरे घर में दो बोर हैं। दोनों सूख गए हैं। नहाने के लिए तालाब जा रहा हूं। मेरे पड़ोसी ने पिछले साल ही 400 फीट गहरा बोर लगवाया था। वो भी पानी नहीं दे रहा है। 10 दिन पहले तक निस्तारी तालाब भी सूख गए थे। गंगरेल डैम से पानी आया तो दो-तीन तालाबों को भरा गया है। यहां से कुछ मीटर की दूरी पर एक शादी समारोह की तैयारी चल रही है। घर के मुखिया बताने लगे कि रोज एक टैंकर पानी मंगवाना पड़ रहा है। 800 रुपया लगता है। पानी खाली करने में देरी होने पर 200 रुपया अतिरिक्त देना पड़ता है। हम रिश्तेदारों के लिए खाने का इंतजाम करें या पीने का, समझ नहीं आ रहा है। इस इलाके में जल संकट वाला रीवा कोई इकलौता गांव नहीं है। महानदी किनारे के कुरूद, कुटेला, चिखली, कागदेगी, मोहमेला जैसे कई गांव हैं जहां के लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं। गांव के ही हरिशंकर दीपक कहते हैं, ‘ अभी हमलोग कुकरा गांव से पानी ला रहे हैं। अगर गांव वाले पानी देना बंद कर दिए तो क्या होगा, यह सोचकर डर लगने लगता है।’ तस्वीर गवाह है… रीवा में पानी के लिए पूरा गांव सड़क पर है। सौर ऊर्जा से एक मात्र नल बमुश्किल 2-3 घंटे चल पाता है। यहां हमेशा 250 से ज्यादा पीपे रखे रहते है, जिनकी बारी 2 से 3 दिन बाद आती है। गांव में चार साल से टंकी तैयार है पर अब तक पानी नहीं आया। अब नल भी टूट रहे हैं। चार जगह बोर फेल हो गया… बेचना पड़ा एक एकड़ खेत
कुरूद गांव के किसान डोमन साहू की कहानी तो और भी पीड़ादायक है। डोमन ने अपने खेत में बोर लगाना चाहा। एक-एक करके चार जगह बोर करवाया, लेकिन पानी कहीं नहीं मिला। इसके चक्कर में उनका एक एकड़ खेत भी बिक गया। कुरूद निवासी संदीप सिन्हा गांव के जागरूक युवा हैं। वे कहते हैं, ‘पहले 30 फीट पर पानी मिल जाता था, अब 300-450 फीट में भी नहीं मिल रहा। महानदी में पिछले दो-तीन साल में रेत खनन बढ़ने के कारण ऐसा हुआ है।’ सरपंच खुद रोज 200 रु. देकर मंगवा रहे 4 पीपा पानी, बोले- 3 माह से शौचालय बंद
सरपंच घसियाराम साहू कहते हैं, ‘रीवा में पानी की स्थिति बहुत खराब है। गांव के 100 से ज्यादा घरों में बोर हैं। 25 सार्वजनिक हैंडपंप हैं । सब सूख चुके हैं। मेरे घर के दो बोर में एक पूरी तरह सूख गया है। दूसरे से रोज मुश्किल से 200 लीटर पानी निकलता है, वो भी गंदा। खुद पानी भरने जा नहीं सकता, इसलिए रोज मजदूर को 200 रुपए देता हूं तो चार पीपा पानी लाता है। घर का शौचालय तीन महीने से बंद है। पूरा गांव निस्तारी के लिए तालाब पर निर्भर है। चार साल पहले अमृत मिशन के तहत पाइपलाइन, नल और पानी टंकी बनी। इस पर करोड़ों रुपए खर्च हुए, लेकिन आज तक एक बूंद पानी नहीं आया। अधिकारी हर बार यही कहते हैं- ‘अभी पानी खोज रहे हैं।’ सांसद, विधायक, मंत्री सबको बता चुके हैं।’ ‘लगता है जितने दिन जिंदगी रहेगी, उतने दिन पानी लाना पड़ेगा’ यहां से आगे बढ़ने पर कुकरा जाने वाली सड़क मिली। सड़क किनारे बने पक्के घर से निकला युवक भी मोटरसाइकिल में पीले पीपे बांधकर पानी लेने जा रहा था। उसने बताया, ‘घर का बोर पानी नहीं दे रहा। कुआं भी सूख गया है। आज पानी नहीं लाया तो खाना नहीं बनेगा। हर साल ऐसे ही पानी के लिए तरसना पड़ता है। अब लगता है, ‘जितने दिन जिंदगी रहेगी, उतने दिन पानी लाना पड़ेगा।’ उसने बताया- ‘नवीन मार्कंडेय ने गांव गोद लिया, विधायक भी बने, लेकिन पानी की व्यवस्था नहीं कर पाए। डहरिया विधायक और मंत्री बने, वे भी कुछ नहीं कर पाए। उमा भारती ने डैम का शिलान्यास किया था, लेकिन आज तक न डैम बना, न पानी मिला। कुकरा रोड पर ही थोड़ा आगे बढ़े तो बेटे के साथ साइकिल से पानी लेकर आ रही महिला तंज कहती हुई बोली, ‘पूरा गांव घूम लीजिए। हर घर के सामने एक नल मिलेगा। हर नल के नीचे जल निकासी के लिए चबूतरा भी बना है। पूरे गांव में पाइप भी बिछ गई है। मुखिया-सरपंच कह रहे थे कि अमृत जल आएगा। अभी तक इसमें एक बूंद जहर भी नहीं आया है।’ सीधी बात -गौरव सिंह, कलेक्टर, रायपुर रीवा गांव में 100 से ज्यादा बोर और 25 से ज्यादा हैंडपंप सूख गए हैं, क्या प्रशासन को इसकी जानकारी है?
– आरंग के पास रीवा गांव है न…हां जानकारी है। यह जल संकटग्रस्त गांव है। रीवा के लोग डरे हुए हैं। पानी के लिए दूसरे गांव जा रहे हैं। वहां से पानी मिलना बंद हो गया तो क्या होगा ?
– ऐसी कोई बात नहीं है। ऐसा नहीं है। दिखवा लेते हैं। रीवा में चार साल से टंकी, पाइपलाइन और नल तैयार है, फिर भी पानी सप्लाई क्यों नहीं हो रही है?
– इसके बारे में पीएचई वालों से बात कर लीजिए।



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