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नरियरा | वट सावित्री व्रत श्रद्धा से मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि, अखंड सौभाग्य की कामना की। दिनभर निर्जला व्रत रखा। वट वृक्ष की पूजा की। सुबह से मंदिरों के पास भीड़ रही। वट वृक्षों के पास भी महिलाएं पहुंचीं। वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधा। परिक्रमा की। पूजा में सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी। परिवार की सुख-शांति की कामना की गई। मान्यता है कि सावित्री ने तप, निष्ठा, बुद्धिमत्ता से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। तभी से यह व्रत पति-पत्नी के प्रेम, समर्पण का प्रतीक माना जाता है। कई जगह महिलाओं ने साथ में पूजा की। भजन-कीर्तन हुआ। पूजा में फल, फूल, रोली, अक्षत, जल, धूप-दीप, मिठाई अर्पित की गई। आदित्य नारायण पाण्डेय के अनुसार वट वृक्ष को त्रिदेवों का स्वरूप माना जाता है।
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वट सावित्री: निर्जला रहकर सुहागिनों ने वट पूजा-अर्चना















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