लखनऊ हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह इस तरह का पहला मामला है, जब कोर्ट ने किसी मेयर की सारी शक्तियां छीन ली हैं। कोर्ट ने ये कार्रवाई लखनऊ मेयर सुषमा खर्कवाल सपा पार्षद को 6 महीने पहले शपथ दिलाने के आदेश का पालन नहीं करने को लेकर सुनाया है।
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मेयर शहर का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति होता है। उसका प्रोटोकॉल सबसे टॉप पर होता है। वह विशेष परिस्थितियों में अहम आदेश भी जारी कर सकता है। शहर की बेसिक सुविधाओं को मेनटेन करने की जिम्मेदारी उसके पास होती है। लखनऊ मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार अब फ्रीज रहेंगे। उनकी जगह नगर आयुक्त और डीएम कामकाज को देखेंगे।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि कोर्ट के आदेश के बाद मेयर को इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन अब मेयर क्या रुख अपनाएंगी, ये देखना है।
मेयर के पास कितनी पॉवर होती है? क्या अधिकार होते हैं? क्या कभी किसी मेयर के अधिकार फ्रीज किए गए हैं? पढ़िए इन सभी सवालों के जवाब भास्कर एक्सप्लेनर में…

सवाल: मेयर के पास क्या शक्तियां होती हैं?
जवाब: मेयर को शहर का प्रथम नागरिक माना जाता है। वह नगर निगम का प्रमुख होता है। उनके पास अपने कार्यालय और कुछ प्रशासनिक कामकाज पर कंट्रोल होता है। वरिष्ठ पत्रकार रतन मणिलाल के अनुसार, मेयर अपनी कैबिनेट यानी मेयर इन काउंसिल (MIC) का गठन करते हैं।
यदि नगर निगम अध्यक्ष कार्य करने में असमर्थ हो, तो मेयर विशेष बैठक बुला सकते हैं और आपदा या महामारी जैसी स्थिति में तत्काल जरूरी निर्णय लेने का अधिकार भी उनके पास होता है। कई मामलों में मेयर को कुछ अधिकार मेयर इन काउंसिल द्वारा सौंपे भी जा सकते हैं।

सवाल: मेयर की व्यवस्था कब से हुई और ये कैसे शहरों पर शासन करते हैं?
जवाब: मेयर को महापौर कहते हैं। ये नगर निगम या महापालिका का प्रमुख होते हैं। देश के बड़े शहरों में महापालिका या नगरनिगम होती हैं। जिनकी आबादी 5 लाख या उससे ज्यादा होती है और क्षेत्रफल के लिहाज वो बड़े होते हैं। छोटे शहरों और नगरों के स्थानीय प्रशासन का काम निर्वाचित नगर पालिका द्वारा किया जाता है। जिसके प्रमुख को नगर पालिका अध्यक्ष या नगर पालिका चेयरमैन कहते हैं।
सवाल: क्या मेयर शहर का पहला नागरिक होने के बाद भी सिर्फ औपचारिक पद होता है?
जवाब: एक्सपर्ट बताते हैं कि कुछ हद तक ऐसा कहा जा सकता है कि मेयर, जो नगरसेवकों के बीच से चुना जाता है, कई मामलों में एक औपचारिक पद जैसा होता है। असल में शहर के कामकाज की असली कार्यकारी, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां नगर निगम आयुक्त के पास होती हैं, जो सरकार द्वारा नियुक्त एक आईएएस अधिकारी होता है। वहीं पूरे नगर निगम प्रशासन को चलाता है।
- मेयर भले ही शहर का प्रथम नागरिक माना जाता हो, लेकिन कई महत्वपूर्ण निर्णयों और प्रशासनिक नियंत्रण में आयुक्त की भूमिका ज्यादा प्रभावी होती है।
- एक्सपर्ट बताते हैं कि मेयरों के पास अब भी बहुत ज्यादा अधिकार और स्वायत्ता नहीं है उन्हें कुछ हद तक कामकाज, वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता ही हासिल है।
- हालांकि पहले उन्हें राज्य सरकार के नियंत्रण में रहना होता था, जो अब 1992 के संशोधन कानून के बाद खत्म हो चुकी है। हालांकि उनकी स्वायत्तता तो बढ़ी है लेकिन इसे और बढ़ाने की मांग की जाती रही है।
सवाल: यूपी में मेयर का चुनाव कैसे होता है?
जवाब: देश के कुछ राज्यों में इनका चुनाव सीधे होता है तो कुछ राज्यों में चुने हुए पार्षद या नगर निगम सदस्य इनको चुनते हैं। हालांकि नगरनिगमों और महापालिकाओं में कार्यकारी शक्ति सरकार द्वारा नियुक्त नगर निगम आयुक्त के पास होती है, जिसे लेकर अक्सर महापौर और नगरनिगम आयुक्त के बीच टकराव की स्थितियां भी बनती रहती हैं।

इस मामले पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट ?
सवाल: लखनऊ मेयर को मिली सजा के क्या मायने हैं?
जवाब: वरिष्ठ पत्रकार रतन मणिलाल का कहना है कि इस मामले में सपा प्रत्याशी की जीत के बाद भी शपथ न दिलाया जाना कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने जैसा है, जो गंभीर लापरवाही या अवमानना की श्रेणी में आता है। मेयर एक निर्वाचित पदाधिकारी होने के बावजूद इस स्थिति में जिम्मेदार माने जा सकते हैं, और कोर्ट का आदेश एक तरह से सजा के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस स्थिति में मेयर के आदेशों की वैधता पर भी सवाल खड़े होते हैं, क्योंकि नियमों का पालन न करना कानूनी स्थिति को प्रभावित करता है।
रतन मणिलाल के मुताबिक, इस पूरे मामले को पहले ही सुलझा लिया जाना चाहिए था। भाजपा प्रत्याशी का चुनाव पहले ही खारिज हो चुका था और जिसे शपथ दिलानी थी, उसे शपथ नहीं दिलाई गई। यह एक अनावश्यक टकराव है, जिसे शुरुआत से ही टाला जा सकता था।

जवाब: लखनऊ मेयर ने कोर्ट के किन बातों को नहीं माना?
जवाब: वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र कुमार कहते हैं कि मेयर ने कोर्ट के नियमों का उल्लघंन किया है। इसलिए कोर्ट ने ये सजा दी है। जिसका असर अब नगर निगम के कामकाज पर सीधा असर पड़ सकता है। मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार फ्रीज होने के बाद कई अहम फैसले फिलहाल रुक सकते हैं।
सुषमा खर्कवाल अब हाई कोर्ट के आदेश के कारण नगर निगम प्रशासन से संबंधित कोई भी फैसला नहीं ले पाएंगी। ऐसे में अब उनके सामने वार्ड पार्षद ललित किशोर तिवारी का शपथ ग्रहण करने का विकल्प बचा है।

यह तस्वीर सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी की है। जब कोर्ट से उन्हें निर्वाचित घोषित किया गया, तब उनके साथियों ने बधाई दी थी। (फाइल फोटो)
लखनऊ मेयर अब किन कामों को नहीं कर पाएंगी?
एक्सपर्ट बताते हैं कि अधिकार सीज होने पर विकास से जुड़ी पत्रावली उनके पास नहीं भेजी जाएंगी। इसके चलते विकास पर असर पड़ेगा। उत्तर प्रदेश नगर अधिनियम, 1959 की धारा 117 के खंड पांच में महापौर के सामान्य अधिनियम का क्रियान्वयन करने के नियंत्रण का जिक्र है, जिसमे लिए कार्यपालिका के अधिकार नगर आयुक्त में निहित बताया गया है।


सवाल: क्या है मामला?
जवाब: लखनऊ नगर निगम के वार्ड 73 में नगर निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदीप शुक्ला ने जीत दर्ज की थी। सपा के ललित किशोर तिवारी दूसरे स्थान पर रहे। ललित किशोर ने कोर्ट में याचिका लगाई कि प्रदीप शुक्ला ने नामांकन के चुनावी हलफानामे में दूसरी शादी और व्यक्तिगत जानकारी छिपाई है। कोर्ट ने प्रदीप शुक्ला के निर्वाचन को रद्द कर दिया। ललित किशोर तिवारी को 19 दिसंबर 2025 को वार्ड 73 के पार्षद के तौर पर निर्वाचित घोषित कर दिया गया।

इधर, मेयर ने ललित किशोर को 5 महीने तक शपथ नहीं दिलाई। इस पर तिवारी कोर्ट चले गए। 21 मई को हाईकोर्ट ने मेयर पर आदेश की अवहेलना माना और उनके प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों को सीज करने का आदेश जारी किया।
















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