डाटा सेंटर क्लस्ट परियोजना एआई मिशन की बुनियाद तैयार करेगी:डाटा सेंटर क्लस्टर को एनसीआर के साथ प्रदेश के अन्य हिस्सों से जोड़ा जाएगा




लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश डाटा सेंटर क्लस्टर परियोजना प्रदेश के एआई मिशन की बुनियादी संरचना तैयार करेगी। सीएम ने कहा कि परियोजना को केवल एनसीआर तक सीमित नहीं रखा जाएगा बल्कि प्रदेश के अन्य हिस्सों से भी जोड़ा जाएगा। सीएम योगी ने बुधवार को अपने सरकारी आवास पर उत्तर प्रदेश डाटा सेंटर क्लस्टर, प्रोजेक्ट गंगा और गेहूं के इन-हाउस प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए मण्डी शुल्क एवं मण्डी सेस में सम्भावित छूट की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि डाटा सेंटर क्लस्टर परियोजना की शुरुआत बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण (बीडा) क्षेत्र से की जा सकती है। बुंदेलखंड में बड़े पैमाने पर जमीन उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि टाटा समूह सहित बड़ी टेक कम्पनियों से संवाद स्थापित कर लखनऊ को ‘ए0आई0 सिटी’ के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य किया जाए। बैठक में अधिकारियों ने बताया कि उत्तर प्रदेश डाटा सेंटर क्लस्टर, प्रदेश को भारत और ग्लोबल साउथ का सबसे बड़ा ए0आई0 कम्प्यूट पावर सेण्टर बनाने की दीर्घकालिक रणनीति है। इसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश को आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस, डेटा सेण्टर, क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर और हाई-टेक डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केन्द्र बनाना है। यह केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि अगले 50 वर्षों के लिए उत्तर प्रदेश की नई आर्थिक संरचना का खाका है। इसके तहत वर्ष 2040 तक 05 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था, 1.5 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार और 05 गीगावॉट एआई कम्प्यूट कॉरिडोर विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्ष 2040 तक दुनिया की नई अर्थव्यवस्था एआई, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, रोबोटिक्स और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे ‘फ्यूचर एरेना’ के इर्द-गिर्द विकसित होगी, जिनका संयुक्त वैश्विक बाजार 29 से 48 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत के लिए एआई सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज, क्लाउड सर्विसेज, साइबर सिक्योरिटी, सेमीकण्डक्टर्स, एयरोस्पेस और ईवी जैसे सेक्टर भविष्य के प्रमुख आर्थिक इंजन होंगे। बैठक में उत्तर प्रदेश को ‘एशिया का मोस्ट सिक्योर, स्केलेबल एवं कनेक्टेड इनलैण्ड ए0आई0 टेरिटरी’ बताया गया। देश के लगभग सभी प्रमुख फाइबर नेटवर्क यूपी से होकर गुजरते हैं और राज्य भारत के सभी समुद्री केबल लैण्डिंग प्वाइण्ट्स से जुड़ा हुआ है। राज्य के भीतर 05 मिलीसेकण्ड से कम लेटेन्सी तथा मुम्बई और चेन्नई जैसे डिजिटल हब तक 5-12 मिलीसेकण्ड कनेक्टिविटी उपलब्ध है। वैश्विक टेक कम्पनियों के लिए यूपी कम लागत, बेहतर स्केलेबिलिटी और अधिक नेटवर्क रिडण्डेंसी वाला आदर्श ए0आई0 इन्फ्रास्ट्रक्चर हब है। मुख्यमंत्री ने ‘प्रोजेक्ट गंगा’ यानी गवर्नेण्ट असिस्टेड नेटवर्क फॉर ग्रोथ एंड एडवांसमेण्ट की समीक्षा करते हुए कहा कि जिन युवाओं को डिजिटल उद्यमी के रूप में चुना जाए, उन्हें गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण दिया जाए। सर्वेक्षण कार्य करने वाली कम्पनियाँ भी इन युवाओं का उपयोग कर सकें, ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए। उन्होंने ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के तेजी से विस्तार और कार्यों में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर बल देते हुए कहा कि शुरुआत से ही डिजिटल उद्यमियों को उचित इन्सेंटिव उपलब्ध कराए जाएं। बैठक में मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि प्रोजेक्ट गंगा ग्रामीण उत्तर प्रदेश में हाई-स्पीड ब्रॉडबैण्ड नेटवर्क पहुँचाने की महत्वाकांक्षी पहल है। इसका उद्देश्य केवल इण्टरनेट उपलब्ध कराना नहीं बल्कि टेलीमेडिसिन, डिजिटल शिक्षा, स्किल डेवलपमेण्ट, ई-गवर्नेंस, डिजिटल रोजगार और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देना है। परियोजना के तहत 10 हजार से अधिक युवाओं को डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर (डी0एस0पी0) के रूप में विकसित करने का लक्ष्य है, जिससे लगभग 50 हजार प्रत्यक्ष और 01 लाख से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है। मुख्यमंत्री ने गेहं के इन-हाउस प्रसंस्करण को बढ़ावा देने की रणनीति की समीक्षा करते हुए मण्डी टैक्स और मण्डी शुल्क व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश की मण्डियों को आधुनिक, स्वच्छ और आकर्षक बनाया जाना चाहिए। मण्डियों में साफ-सफाई, रंगाई-पुताई, पर्वों के दौरान लाइटिंग, अतिक्रमण हटाने और बेहतर प्रबन्धन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मुख्यमंत्री ने अल नीनो के सम्भावित प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आगामी वर्षों में फसलों पर इसका असर पड़ सकता है, इसलिए प्रदेश को खाद्यान्न सुरक्षा के लिए अभी से तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा कि राज्य के खाद्यान्न भण्डार पर्याप्त और मजबूत होने चाहिए। बैठक में अवगत कराया गया कि उत्तर प्रदेश, देश का सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक राज्य है। वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 372 लाख मीट्रिक टन गेहूँ उत्पादन का अनुमान है, जबकि कुल उपलब्धता 407 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचती है। प्रदेश में लगभग 2.88 करोड़ किसान गेहूँ उत्पादन से जुड़े हैं। इसके बावजूद सीमित प्रसंस्करण क्षमता के कारण बड़ी मात्रा में गेहूँ कच्चे अनाज के रूप में दूसरे राज्यों में चला जाता है, जिससे मूल्य संवर्धन, जी0एस0टी0 राजस्व और रोजगार के अवसर प्रदेश से बाहर चले जाते हैं। प्रदेश में 559 रोलर फ्लोर मिल्स हैं, जिनकी कुल मिलिंग क्षमता 218.4 लाख मीट्रिक टन है, लेकिन वास्तविक उपयोग केवल 126.45 लाख मीट्रिक टन तक सीमित है। इसके अलावा, 40 हजार से अधिक आटा चक्कियांँ भी संचालित हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि राज्य के भीतर ही गेहूँ प्रसंस्करण को बढ़ावा मिले तो रोजगार, बिजली खपत, जी0एस0टी0 संग्रह और खाद्य उद्योगों में बड़ा विस्तार हो सकता है। समिति ने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश में पंजीकृत मिलों द्वारा राज्य के भीतर प्रसंस्करण हेतु खरीदे गए गेहूँ पर मण्डी शुल्क एवं विकास उपकर में छूट दी जाए, लेकिन व्यापारिक गतिविधियों पर यह छूट लागू न हो।



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