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रात के अंधेरे में पीछे से किसी के आने का डर लगना या कोई आवाज सुनाई देना सामान्य बात हो सकती है। लेकिन जब कोई इंसान यह जानते हुए भी कि आसपास कोई नहीं है, अजीब आवाजें सुनने लगे, तो लोग इसे भूत-प्रेत का साया या टोना-टोटका मान लेते हैं। लोग मौलवी और पुजारियों के चक्कर में पड़कर झाड़-फूंक कराने लगते हैं। मानसिक रोग विशेषज्ञ के पास जाने से सिर्फ इसलिए बचते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे कोई पागल थोड़ी हैं। एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. धनंजय चौधरी ने कहा कि यह कोई ऊपरी चक्कर नहीं, बल्कि ‘स्किजोफ्रेनिया’ नाम की एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसका इलाज पूरी तरह संभव है। अब ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बीमारी के मरीजों की संख्या बढ़कर 18% तक पहुंच गई है। मनोरोग के मरीजों में 18% स्किजोफ्रेनिया के शिकार एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि मनोरोग विशेषज्ञों के पास आने वाले कुल मरीजों में करीब 18 फीसदी मरीज स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित होते हैं। राहत की बात यह है कि नियमित दवा लेने से ज्यादातर मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। कुछ मामलों में चार-पांच साल दवा चलने के बाद इसे बंद भी कर दिया जाता है। वहीं, कुछ मरीजों में बीपी या शुगर की तरह दवाएं लंबे समय तक चलती हैं, जिससे बीमारी पूरी तरह नियंत्रण में रहती है और मरीज सामान्य व प्रोडक्टिव जीवन जी सकता है। वह अपना काम कर सकता है और पैसे भी कमा सकता है। व्यवहार में बदलाव और शक होना इसके शुरुआती लक्षण इस बीमारी की शुरुआत में व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव आ जाता है और वह अनर्गल बातें करने लगता है। कई बार मरीज को खाना दिया जाए तो वह उसे खाने के बजाय शरीर पर लपेटने लगता है। इस अजीब व्यवहार के साथ ही वह अकेले में बैठकर खुद से बातें करने लगता है, बुदबुदाता है, अचानक गुस्सा हो जाता है या बिल्कुल चुप हो जाता है। मरीज को यह गंभीर शक होने लगता है कि लोग उसके पीछे पड़े हैं, उसका पीछा कर रहे हैं या उसे मारना चाहते हैं। उसे यह भी लगने लगता है कि उसकी बातें लोग सुन रहे हैं और जो वह सोच रहा है, उसे सब जान रहे हैं। कोरोना काल का एक हैरान करने वाला मामला डॉक्टरों के पास इस बीमारी के कई चौंकाने वाले केस आते हैं। कोविड काल का एक मामला ऐसा भी आया, जहां परिवार के एक सदस्य की मौत के बाद भी बीमारी के असर में शव को करीब दो साल तक घर में ही संभालकर रखा गया। उस पर लेप लगाया जाता रहा और घरवाले यही सोचते रहे कि वह मरे नहीं हैं, बल्कि जिंदा हैं और बात करते हैं। आज स्थिति यह है कि सिर्फ कानपुर ही नहीं, बल्कि गोरखपुर, जबलपुर, ग्वालियर, बांदा और गोंडा जैसे दूर-दराज के इलाकों से भी ऐसे मरीज इलाज के लिए बड़े डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं और ठीक हो रहे हैं। बचाव के लिए बच्चों को सिखाएं तनाव से लड़ना डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि इसके पीछे कई अनुवांशिक यानी जेनेटिक कारण होते हैं, जिससे इंसान में यह बीमारी होने की संभावना पहले से रहती है। ऐसे में जब जीवन में अचानक कोई बड़ा तनाव या स्ट्रेसफुल माहौल आता है, तब यह बीमारी उभरकर सामने आ जाती है। इससे बचने के लिए जरूरी है कि हम स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और तनाव कम लें। साथ ही बच्चों को बचपन से ही विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के तरीके सिखाएं, ताकि वे किसी भी परेशानी को आसानी से झेल सकें और मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।
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'भूत नहीं होते, ये सिक्जोफ्रेनिया, मौलवी-पुजारी नहीं, डॉक्टर देखेंगे':अजीब व्यवहार और शक होने पर झाड़-फूंक नहीं, डॉक्टर से मिले; 18% ऐसे मामले आ रहे















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