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देश में संभावित इंधन की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार लोगों से पेट्रोल-डीजल की बचत की अपील कर रही है। प्राइवेट की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है, पर रांची में तो यह अपील ही बेमानी लग रही है। रांची को राजधानी बने 25 साल हो गए हैं, पर शहर में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली विकसित ही नहीं हो पाई है। शहर में सिटी बसों के लिए 7 रूट निर्धारित की गई थी, पर सिर्फ एक रूट कचहरी चौक से मेन रोड, राजेंद्र चौक होते हुए धुर्वा तक ही सिटी बसें चल रही हैं। बाकी की 6 रूटों पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेवा है ही नहीं। 15 लाख से अधिक आबादी वाले शहर का बोझ सिर्फ 22 सिटी बसें उठा रही हैं, जो सिर्फ एक रुट पर चल रही है। ये बसें भी मेंटेनेंस के अभाव में जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी हैं। िफर भी लोग सफर करने को मजबूर हैं। शनिवार को भास्कर ने सिटी बसों की पड़ताल की तो पाया कि जिस बस में अधिक से अधिक 35 से 40 लोग बैठ सकते हैं, उसमें 60-70 लोग सवारी कर रहे थे। स्त्री-पुरुष सभी ठसाठस भरे हुए थे। बस में यात्रा कर रहे लोगों ने बताया कि यह तो रोज की बात है। भीड़ के कारण बस के अंदर सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। पसीना, घुटन और धक्का-मुक्की, छेड़खानी आम बात है। अल्बर्ट एक्का चौक पर सिटी बस के इंतजार में खड़े कुछ यात्रियों ने बताया कि उन्हें धुर्वा जाना है। आधे घंटे से सिटी बस का इंतजार कर रहे हैं, पर अभी तक बस नहीं आई। जहां पहुंचना है, वहां समय से पहुंचना मुश्किल लग रहा है। मजबूरन उन लोगों को ऑटो का सहारा लेना पड़ा। ऐसे में जनता पब्लिक ट्रांसपोर्ट से कैसे यात्रा करेगी। परिवहन व्यवस्था टोटो और ऑटो पर निर्भररांची में फिलहाल करीब 22 से 25 हजार ऑटो और ई-रिक्शा सड़कों पर चल रहे हैं। इनमें 18 हजार से अधिक डीजल ऑटो, करीब 6,254 सीएनजी ऑटो और लगभग 1,500 ई-रिक्शा शामिल हैं। परिवहन विभाग के मुताबिक राजधानी में वैध परमिट वाले डीजल ऑटो की संख्या सिर्फ 3,335 है। इसके बावजूद 10 हजार से अधिक डीजल ऑटो बिना परमिट या नियमों के संचालन करते पाए गए हैं। मेट्रो ट्रांसपोर्ट सिस्टम अब बस सपनों में हीरांची में मेट्रो ट्रेन परियोजना करीब एक दशक से चर्चा में है, लेकिन अब तक जमीन पर काम शुरू नहीं हो सका है। 2016-17 में पहली बार मेट्रो और मोनोरेल का प्रस्ताव आया था। पर कम यात्री संख्या और भारी लागत के कारण योजना आगे नहीं बढ़ी। अब राज्य सरकार ने 51 किमी लंबे तीन कॉरिडोर का नया प्रस्ताव केंद्र को भेजा है। फिलहाल डीपीआर और वैकल्पिक अध्ययन रिपोर्ट तैयार हो रही है। ग्राम गाड़ी योजना में अब नहीं चल रहीं बसेंगांवों को प्रखंड और जिला मुख्यालय से जोड़ने के लिए शुरू की गई मुख्यमंत्री ग्राम गाड़ी योजना कई जिलों में धीमी पड़ गई है। राज्य में 4 हजार से अधिक ग्रामीण रूट चिह्नित किए गए थे, लेकिन कई मार्गों पर अब बसें अनियमित या बंद हैं। ऑपरेटर कम यात्रियों, बढ़ती डीजल कीमत और सब्सिडी भुगतान में देरी को बड़ी वजह बता रहे हैं। खराब सड़कों के कारण बरसात में कई रूट ठप हो जाते हैं। सिर्फ रंग बदल रहा बसों का, व्यवस्था वही10 साल पहले खरीदी गई बसों का रंग लाल था, बाद में मंईयां सम्मान योजना लागू होने के बाद इसका रंग बदलकर गुलाबी कर दिया गया, लेकिन पिछले साल सभी बसों का रंग फिर बदलकर नीला कर दिया गया। बसों में सरकार की योजनाओं का बखान किया गया है, लेकिन आप बस के अंदर बैठ जाएं तो व्यवस्था को कोसते हुए ही सफर पूरी होगी। बसों में यात्रियों को ठूंस-ठूंस कर ले जाया जा रहा है। आगे क्या…17 नई बसों की खरीद के लिए टेंडर जारी: 17 नई सिटी बसों की खरीदारी के लिए टेंडर जारी किया गया है। इसके अलावे 244 सिटी बसों को वेंडर के द्वारा चलाए जाने की भी योजना है। इसका भी टेंडर खुला है। प्रस्ताव नगर विकास विभाग को भेजा गया है। मगर अभी तक इस पर निर्णय नहीं हो पाया है। पिछले 16 वर्षों से हिचकोले खा रही परिवहन प्रणाली रांची को राजधानी बने 25 साल हो गए हैं। इतने वर्षों के बाद भी शहर में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली विकसित नहीं हुई। निगम ने वर्ष 2010 में 70 सिटी बसों की खरीदारी की थी। वे सभी बसें कंडम हो गईं। अब वे खादगढ़ा बस स्टैंड में लगी हैं। इसके बाद निगम ने वर्ष 2016 में टाटा मोटर्स की 26 सिटी बसों की खरीदारी की। नई बस आने से यात्रियों को बड़ी राहत मिली, लेकिन इसका भी मेंटेनेंस नहीं होने से बसें जर्जर होने लगीं। इन्हीं 26 बसों में से 22 अभी सड़क पर चल रही हैं। पिछले 5 वर्षों से सार्वजनिक परिवहन प्रणाली दुरुस्त करने की कवायद चल रही है। शहर में 244 नई सिटी बसें चलाने की योजना बनी थी। इसके लिए टेंडर किया गया। जिस मॉडल पर बसों का परिचालन किया जाना था, उसके लिए कोई कंपनी आगे नहीं आई। पिछले वर्ष दो कंपनियां बस खरीद कर चलाने के लिए तैयार हुईं। तब दो टेंडर पड़े। निगम ने टेंडर का मूल्यांकन कर प्रस्ताव नगर विकास विभाग को भेजकर मार्गदर्शन मांगा, लेकिन आज तक विभाग ने उक्त प्रस्ताव पर कोई निर्देश नहीं दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि सिटी बसें फाइलों में चलती रहीं। 11 करोड़ रुपए खर्च, पर बसें चल रहीं मात्र 22 पिछले 25 सालों में रांची नगर निगम ने सार्वजनिक परिवहन के नाम पर करीब 11 करोड़ रुपए खर्च करके 96 सिटी बसों की खरीदारी की। यह पैसे भी केंद्र सरकार से जेएनएनयूआरएम योजना के तहत मिले थे। उक्त फंड से पहले फेज में 2010 में 7.50 करोड़ से 70 सिटी बसों की खरीदारी की गई। निगम बस खरीदने के बाद चलाने के लिए ऑपरेटर खोजता रहा, लेकिन नहीं मिला। तीन माह तक बस पार्किंग में खड़ी रही। इसके बाद इसे चलाने की जिम्मेदारी जेटीडीसी को दे दी गई। जेटीडीसी ने पांच साल बस चलाने के बाद निगम को वापस कर दिया। इसके बाद 4 बसें जल गईं, बाकी जो बचीं, वे कबाड़ हो गईं। इसके बाद वर्ष 2016 में करीब 3 करोड़ की लागत से 26 नई बसें खरीदी गईं। इसमें से 22 बसें मेन रोड में चल रही हैं।
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रांची में 7 में से सिर्फ एक रूट पर ही चल रही सिटी बस, ग्राम गाड़ी योजना भी फेल












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