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रिम्स में हाल ही में एमबीबीएस सेकेंड ईयर के छात्र ने फांसी लगाकर जान दे दी। शुरुआती जांच में इसे प्रेम प्रसंग से जुड़ा मामला बताया। लेकिन इस घटना ने मेडिकल और इंजीनियरिंग छात्रों के तनाव, अकेलेपन और मानसिक डिप्रेशन को एक बार फिर सामने ला दिया, जिस पर कोई खुलकर बात नहीं करना चाहता। इस घटना के बाद रिम्स के डीन स्टूडेंट वेलफेयर डॉ. शिव प्रिये ने माना कि रिम्स में यूजी से लेकर पीजी तक के हर बैच के कुछ छात्र तनाव, अवसाद और मानसिक परेशानी से जूझ रहे हैं। रिनपास और केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीआईपी) में इलाज करा रहे हैं। दैनिक भास्कर ने रिनपास और सीआईपी के पांच साल के आंकड़े खंगाले तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। पढ़ाई का दबाव और अकेलापन बड़ी वजह…सीआईपी के विशेषज्ञ मानते हैं कि मेडिकल छात्रों को लंबा सिलेबस, लगातार परीक्षा, क्लिनिकल जिम्मेदारियां, नींद की कमी और परिवार की अपेक्षाएं मानसिक रूप से थका देती हैं। वहीं रिम्स के एक वरिष्ठ शिक्षक ने कहा कि कई छात्र मदद मांगने से हिचकते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि मानसिक परेशानी स्वीकार करना कमजोरी समझी जाएगी। यही चुप्पी कई बार स्थिति को गंभीर बना देती है। रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार की अपील पैरेंट्स बच्चों से संपर्क में रहें रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार ने कहा कि छात्रों में तनाव की समस्या बढ़ रही है। ऐसे में अभिभावकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। पैरेंट्स अपने बच्चों से लगातार बातचीत करते रहें। उनके व्यवहार में किसी तरह का बदलाव दिखे तो तुरंत गंभीरता से लें। यदि किसी छात्र में तनाव, अकेलापन या व्यवहार में असामान्यता दिखे तो परिवार और कॉलेज प्रशासन दोनों को मिलकर सहयोग करना चाहिए, ताकि छात्र को सुरक्षित और सकारात्मक माहौल मिल सके।
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सीआईपी-रिनपास के आंकड़ों ने खोले राज:5 साल में 20 हजार से ज्यादा छात्र मानसिक परेशानी लेकर रिनपास और सीआईपी पहुंचे, इनमें 3000 मेडिकल, 6000 इंजीनियरिंग के स्टूडेंट









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