शाजापुर में 16 मई को यात्री बस में चार साल का अनय जैन जिंदा जल गया था। बताया जा रहा है कि बस में इमरजेंसी गेट नहीं खुलने से बच्चा बाहर नहीं निकल सका। इस रूट पर ज्यादातर बसों में नियमों का पालन नहीं किया जा रहा। इमरजेंसी गेट तो लात और हथौड़ा मारने पर
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हादसे के बाद दैनिक भास्कर की टीमउस रेस्टोंरेंट के सामने पहुंची, जहां बस जली थी। यहां जलने की गंध आ रही है। इसके बाद हम इस उम्मीद से बस स्टैंड पहुंचे कि हादसे के बाद हालात कुछ बदले होंगे। लेकिन, यहां तो नजारा ऐसा था कि दो दिन पहले कुछ हुआ ही नहीं।
पहले ये दो तस्वीरें देख लीजिए…

बस में इमरजेंसी गेट को लात मारकर खोलना पड़ा।

धक्का देने के बाद भी बस का इमरजेंसी गेट नहीं खुला।
अब नीचे जो तस्वीर लगी है, वो उस पिता की है, जिनका चार साल का बेटा दो दिन पहले शाजापुर में ग्वालियर जा रही बस में जिंदा जल गया। पहले इन्होंने दूसरों की मदद की, लेकिन बेटे को नहीं बचा पाए।

16 मई को अपने बेटे का शव देखकर पिता फफक पड़े।
पिता बोले- दूसरों को बचाया, बेटे को खो दिया
मृतक अनय के पिता अभिषेक जैन ने बताया- मैं सबको बचा रहा था, लेकिन अपने चिराग को नहीं बचा पाया। ऐसे बस संचालकों और जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
अभिषेक जैन कहते हैं कि दूसरों की मदद के बाद में बेटे को निकालने दौड़ा, लेकिन आग इतनी तेजी से फैली कि बस में घुस ही नहीं सकता था। इमरजेंसी गेट खोलने का साधन नहीं था। पीछे खिड़की खोलने का साधन नहीं था। ड्राइनर क्लीनर आग लगते ही भाग गए। अगर कार्रवाई होती है, तो ऐसी होनी चाहिए जो नजीर बने, ताकि भविष्य में ऐसा हादसा न हो, कोई मेरे जैसा पिता न कहलाए।
इमरजेंसी एग्जिट गेट आखिर खुला क्यों नहीं?
16 मई की रात करीब 9 बजे बस इंदौर से ग्वालियर के लिए रवाना हुई थी। रात करीब 12 बजे शाजापुर से करीब 20 किलोमीटर दूर रेस्टोरेंट पर ब्रेक के लिए रुकी थी। महिला यात्री मालती शर्मा कहती हैं कि बस में पहले वायरिंग जलने की गंध आई।
इसके बाद बोनट से आग भड़की थी। यात्री कांच तोड़ और कूदकर भागे। लेकिन, 4 साल का मासूम अनय जैन अंदर ही फंस गया और जिंदा जल गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बस में मौजूद इमरजेंसी एग्जिट गेट आखिर खुला क्यों नहीं?
अगर बस छोड़कर भागने की जगह ड्राइवर, कंडक्टर और क्लीनर इमरजेंसी गेट खोलते तो संभव था अनय की जान बच जाती।

16 मई को इसी बस में बच्चा जिंदा जल गया था।
भास्कर टीम ने 25 से 30 बसों की जांच की
दैनिक भास्कर की टीम ने हादसे के बाद शाजापुर में 25 से 30 बसों की जांच की। इसमें चौंकाने वाली लापरवाही सामने आई। ज्यादातर बसों में इमरजेंसी गेट केवल दिखावे के लिए लगे मिले। कहीं गेट रस्सियों से बांध दिए गए थे, तो कहीं गेट के सामने सीट थी।
कई बसों में इमरजेंसी गेट खोलने के लिए ड्राइवर या कंडक्टर से अलग चाबी लेनी पड़ती है। यानी हादसे के समय यात्री खुद अपनी जान नहीं बचा सकते। कई बसों में लात और हथौड़ी से भी इमरजेंसी गेट नहीं खुला।
फायर फाइटर सिस्टम, फर्स्ट एड बॉक्स भी नहीं
बसों में फायर फाइटर सिस्टम और फर्स्ट एड बॉक्स भी नहीं था। एक ड्राइवर ने साफ कहा कि “अभी हटाया है, सेठ बोले हैं, बाद में लगवा देंगे।” दूसरे ने कहा कि “छोटा अग्निशमन यंत्र है, बड़ा मंगवाएंगे।” यानी यात्रियों की सुरक्षा बस मालिकों और प्रशासन दोनों की प्राथमिकता में ही नहीं है।
बस में सफर कर रहे यात्री जय वर्मा ने कहा कि बसों में क्षमता से ज्यादा सवारियां भरी जाती हैं। इमरजेंसी गेट केवल नाम के हैं। बाहर से सिम और रस्सियां बांध दी जाती हैं। यदि हादसा हो जाए तो यात्रियों के पास बचने का रास्ता नहीं रहता।

बस में फायर सेफ्टी उपकरण भी नहीं थे।
बसों की सुरक्षा जांच में सामने आई बड़ी लापरवाही
1. कलजोरिया बस (ब्यावरा– इंदौर)
शाजापुर आने का समय दोपहर 1:10
स्थिति: 42 सीटर बस होने के बावजूद क्षमता से अधिक यात्री सवार मिले। इमरजेंसी गेट के पास सीट लगी थी। आपातकालीन स्थिति में निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी।
2. घनश्याम बस (शाजापुर – पोलायकला)
शाजापुर बस स्टैंड पर आने का समय दोपहर 1 बजे
स्थिति: 42 सीटर बस में अग्निशमन यंत्र नहीं मिला। जंग लगने के कारण इमरजेंसी गेट खुल नहीं रहा था।
3. मां राजराजेश्वरी बस (शाजापुर – उज्जैन)
स्थिति: 42 सीटर बस का इमरजेंसी गेट खराब मिला। ड्राइवर को खुद जोर लगाकर गेट खोलना पड़ा। अग्निशमन यंत्र भी दिखाई नहीं दिया।
4. सर्राफ बस (आरोन गांव – इंदौर)
शाजापुर आने का समय दोपहर 12 बजे
स्थिति: 42 सीटर बस का एग्जिट गेट रस्सी से बंधा मिला। बस बाद में इंदौर के लिए रवाना हुई।

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