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बरेली में फर्जी आईएएस बनकर करोड़ों की ठगी करने वाले गिरोह की जांच में नया मोड़ आया है। इस मामले में कथित सरगना विप्रा शर्मा के साथ अब महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के एक कर्मचारी का नाम भी सामने आया है। आरोप है कि उसने बेरोजगार युवाओं को सरकारी नौकरी का झांसा देकर लाखों रुपये ठगे। एसएसपी के आदेश पर बारादरी थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई है। कालीबाड़ी निवासी उमेश चंद्र शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय कर्मचारी देवप्रकाश उनकी कपड़े की दुकान पर आता-जाता था। देवप्रकाश ने उन्हें बताया कि डॉ. विप्रा शर्मा विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं और अब एक आईएएस अधिकारी हैं। उसने यह भी दावा किया कि विप्रा की चयन आयोग तक पहुंच है और वह सरकारी नौकरी दिला सकती हैं। देवप्रकाश के इस दावे पर भरोसा कर उमेश ने अपनी भतीजी आरोही शर्मा, तनवी शर्मा और भांजी गौरी मिश्रा को कंप्यूटर ऑपरेटर पद पर नौकरी दिलाने के लिए विप्रा से संपर्क किया। आरोप है कि इस एवज में विप्रा को कुल दस लाख रुपये नकद और ऑनलाइन माध्यम से दिए गए। शिकायत के अनुसार, यह ठगी केवल एक परिवार तक सीमित नहीं थी। बिहारीपुर निवासी सचिन ने चपरासी की नौकरी के लिए चार लाख रुपये दिए। डीके शर्मा ने लिपिक पद के लिए साढ़े चार लाख रुपये खाते में ट्रांसफर किए और चार लाख रुपये नकद दिए।
विक्रम गंगवार ने दस लाख, नितिन ने साढ़े पांच लाख और फतेहगंज पश्चिमी निवासी हृदेश कुमारी ने पचास हजार रुपये दिए। सभी पीड़ितों को सरकारी नौकरी का भरोसा दिलाया गया था और रकम वापस करने की भी गारंटी दी गई थी। उमेश का आरोप है कि कुछ समय बाद देवप्रकाश और विप्रा कथित नियुक्ति पत्र लेकर पहुंचे। हालांकि, जब लंबे समय तक किसी को नौकरी नहीं मिली तो पीड़ितों को संदेह हुआ। विरोध करने पर विप्रा ने रकम लौटाने के लिए चेक दिए, लेकिन वे फर्जी निकले और उनका भुगतान नहीं हो सका। एसएसपी अनुराग आर्य के निर्देश पर बारादरी पुलिस ने उमेश चंद्र शर्मा की शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।
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फर्जी IAS के नाम पर नौकरी का खेल:रुहेलखंड विश्वविद्यालय कर्मचारी पर भी ठगी का मुकदमा














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