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भोपाल के एनिमल एक्टिविस्ट अयान अली सिद्दीकी इस ईद-उल-अजहा पर एक बार फिर अनोखी पहल करने जा रहे हैं। वे हर साल की तरह इस बार भी बिना किसी जानवर की कुर्बानी दिए कटहल की बिरयानी बनाकर जरूरतमंदों तक पहुंचाएंगे। उनका उद्देश्य समाज में करुणा, दया और साझेदारी की भावना को मजबूत करना है। अयान सिद्दीकी, जो पशु संरक्षण और संवेदनशीलता को लेकर सक्रिय रहते हैं, का मानना है कि त्योहारों का असली मकसद इंसानियत को बढ़ावा देना है। उन्होंने बताया कि वे लंबे समय से इस तरह की पहल कर रहे हैं, जिसमें वे शाकाहारी विकल्प अपनाकर लोगों तक भोजन पहुंचाते हैं और जरूरतमंदों की मदद करते हैं। अयान बोले- कुर्बानी प्रतीकात्मक भी हो सकती है जब उनसे पूछा गया कि वे यह पहल खासतौर पर ईद के मौके पर ही क्यों करते हैं, तो अयान ने कहा कि उनका उद्देश्य लोगों के दिलों को जोड़ना और एक सकारात्मक संदेश देना है। उन्होंने कहा, “ईद-उल-अजहा का असली अर्थ करुणा, बांटना और त्याग की भावना है, न कि केवल खून बहाना। कुर्बानी प्रतीकात्मक भी हो सकती है।” अयान ने शहरवासियों से अपील की है कि वे इस ईद पर अपने अंदर की बुराइयों की कुर्बानी दें और जरूरतमंदों की मदद कर त्योहार को सार्थक बनाएं। उन्होंने सभी को ईद-उल-अजहा की मुबारकबाद देते हुए भाईचारे और इंसानियत के साथ पर्व मनाने का संदेश दिया। 28 मई को मनाई जाएगी बकरीद शहर में रविवार शाम ज़िलहिज्जा (बकराईद) का चांद नजर नहीं आया। इसके बाद रॉययत-ए-हिलाल कमेटी, भोपाल की बैठक मोती मस्जिद में आयोजित की गई, जिसमें उलेमा और कमेटी के सदस्यों ने चांद देखने की पुष्टि नहीं होने की जानकारी दी। कमेटी के अनुसार, 29 ज़ीकादा 1447 हिजरी के मुताबिक 17 मई 2026 को मगरिब की नमाज के बाद चांद देखने की कोशिश की गई, लेकिन चांद दिखाई नहीं दिया। इसके चलते सर्वसम्मति से फैसला लिया गया कि 1 ज़िलहिज्जा 1447 हिजरी 19 मई 2026 (मंगलवार) से शुरू होगा। इस निर्णय के आधार पर ईद-उल-अजहा (बकरीद) 10 ज़िलहिज्जा को यानी 28 मई 2026 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। कमेटी के पदाधिकारियों और सदस्यों ने लोगों से आपसी भाईचारे और शांति के साथ त्योहार मनाने की अपील की है। बैठक में शहर के प्रमुख उलेमा और कमेटी सदस्यों ने भाग लिया तथा चांद से जुड़ी स्थिति पर विचार-विमर्श के बाद आधिकारिक घोषणा की गई। ये खबर भी पढ़ें… भोपाल में पशु-पक्षी के अंगों के साथ पैदल मार्च ‘जब मैं सात साल का था, तब ईद पर कुर्बानी के लिए घर में एक जानवर आया। कहा गया कि इसे अपना ‘अजीज दोस्त’ समझो। कुछ दिन बाद उसी जानवर को अल्लाह के नाम पर काट दिया गया। मैं रोते-रोते बेहोश हो गया। शाम को जब उसी जानवर का मांस खाने को दिया गया, तो मेरा गला बंद हो गया। उस दिन मुझे समझ आ गया कि जानवर खाने के लिए नहीं, दोस्त बनने के लिए होते हैं।पढ़ें पूरी खबर
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खून नहीं, करुणा और सेवा है ईद-उल-अजहा का संदेश:अयान अली बांटेंगे कटहल बिरयानी, कहा- प्रतीकात्मक कुर्बानी भी हो सकती है













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