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भोपाल के जयप्रकाश (जेपी) जिला अस्पताल में मरीजों को पूरी दवाएं नहीं मिल पा रहीं। स्थिति यह है कि पर्चे पर लिखी करीब 40 प्रतिशत दवाएं बाजार से खरीदनी पड़ रहीं हैं। डॉक्टर तक रोगियों को बता रहे हैं कि यह दवा जरूरी है लेकिन आपको बाहर मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ेंगी। दैनिक भास्कर रिपोर्टर ने मरीज बनकर पड़ताल की तो दवा काउंटर पर कई दवाएं उपलब्ध नहीं मिलीं। काउंटर पर मौजूद फार्मासिस्ट ने कहा कि दवाएं अभी हमारे पास नहीं हैं। ऑर्डर की गई हैं, जब आएंगी तो दे दी जाएंगी। मरीजों को जन औषधि केंद्र या मेडिकल स्टोर का सहारा लेना पड़ा। पढ़े मरीज और फार्मासिस्ट की बातचीत फार्मासिस्ट- जो दवाइयां नहीं हैं उस पर टिक लगा दिया है। डॉक्टर से बात कर लीजिए। रिपोर्टर- डॉक्टर ने पहले ही कहा था ये मेडिसिन नहीं मिलेगी। फार्मासिस्ट- तब आप देख लीजिए आपकी मर्जी रिपोर्टर- मेरी मर्जी क्या, आप बताओ कब तक आएंगी? फार्मासिस्ट- हमने दवा न होने की सूचना दे दी है। इंडेंट कर दिया है। इसके बाद आवेदन सेंट्रल स्टोर जाता है। वहां से जब दवा आएंगी तो हम इशू कर देंगे। रिपोर्टर- आप मुझे कैसे सूचित करेंगे, आपके पास मेरा नंबर है? फार्मासिस्ट- मैं आपको कैसे सूचित करूंगा। अगर सबको कॉल करूंगा तो महीने के 1 लाख पेशेंट हो जाएंगे। मैं सबको कॉल करूं या दवाइयां बांटूं। रिपोर्टर और जन औषधि केंद्र के कैमिस्ट की बातचीत फार्मासिस्ट से बात करने के बाद रिपोर्टर जन औषधि केंद्र पहुंची। जहां कैमिस्ट रजनीश मौजूद थे। रिपोर्टर- इसमें जिन दवाओं पर टिक लगा है वो क्या काम करती हैं? कैमिस्ट- ये दवाएं पेट से जुड़ी समस्याओं के लिए हैं। आपको क्या दिक्कत आ रही है? रिपोर्टर- मेरे गले में दर्द है। कुछ खा नहीं पा रही हूं। कैमिस्ट- ऐसा पेट में एसिड बढ़ने पर भी होता है। रिपोर्ट की दवाइयों को देखकर कैमिस्ट ने कहा गले के लिए उन्होंने एक ही दवा लिखी है, दूसरी दवा लिखी नहीं है। वो भी ले लो, दोनों साथ में खाने से ज्यादा आराम मिलता है। रिपोर्टर- कौन सी नहीं लिखी है? गले में दर्द से राहत की दवा तो दी है। कैमिस्ट- हां एक ही दवा लिखी है। एक और लिखनी चाहिए थी। रिपोर्टर – तो क्यों नहीं लिखी? कैमिस्ट- पता नहीं क्यों नहीं लिखी, डॉक्टर ने लिखा है या किसी इंटर्न ने। मतलब कम उम्र का था। रिपोर्टर- हां। लेडी थी। कैमिस्ट- शायद उसे पता नहीं होगा। इसलिए नहीं लिखी है। डॉक्टर भी बाहर से खरीद रहे मास्क रिपोर्टर और कैमिस्ट की बातचीत चल रही थी तभी एक डॉक्टर मास्क लेने जन औषधि केंद्र आई। 20 रुपये के 4 मास्क खरीदे। रिपोर्टर- मास्क तो अस्पताल में डॉक्टर्स को फ्री में मिलता है ना। डॉक्टर – नहीं हमें खुद के पैसे से खरीदना पड़ता है। पुराने वाले सर थे तब मास्क का डिब्बा रखा रहता था पर अब नहीं रहता है। रिपोर्टर- ग्लव्स भी खुद खरीदते हैं? डॉक्टर- वो भी खुद ही लेना है। रिपोर्टर- पर खरीदने के लिए सरकार तो पैसा देती होगी। कैमिस्ट- आता है पर खा पी जाते हैं। रिपोर्टर- और मरीजों को यहां भेज देते हैं। कैमिस्ट- हां 3 साल से हूं, पूरी दवा कभी नहीं रहती है। लगभग सभी लोग वहां से दवा न मिलने पर यहां आते हैं। सुबह में भीड़ लगी रहती है। मान लीजिए अंदर 100 तरह की मेडिसिन है, तो पूरी कभी नहीं रहती है। कुछ न कुछ घटा ही रहता है। दवा नहीं मिली तो डॉक्टर से बदलवाने पहुंचे मरीज अस्पताल में दवा लेने आए विनोद पटेल ने बताया कि डॉक्टर ने जो दवा लिखी थी, वह दवा नहीं है। इसलिए वो दवा बदलवाने दोबारा डॉक्टर के पास जा रहे हैं। उन्हें फिर से लाइन में लगना होगा। जो काम 1 घंटे में हो जाता उसमें 2 घंटे लगेंगे। वह सुबह जल्दी आए थे ताकि जल्दी से इलाज हो पर दवा न मिलने से फिर से परेशान होना होगा। ये सिर्फ विनोद की कहानी नहीं है, ऐसे कई मरीज हैं जो दवा न मिलने पर या तो दवा बदलवाने के लिए फिर से लंबी लाइनों में लग रहे हैं। यहां बाहर से पैसे देकर दवा ले रहे हैं। इंटर्न भी खुद खरीद रहे ग्लव्स और मास्क जन औषधि केंद्र पर एक इंटर्न मास्क खरीदने पहुंची। बातचीत में उसने बताया कि उन्हें ग्लव्स और मास्क जैसी बेसिक चीजें भी बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। जब पुराने सर थे तो मास्क रखे रहते थे, अब खुद खरीदना पड़ता है। मास्क और ग्लव्स के लिए सरकार तो पैसे देती है पर वो कहां जाते हैं किसी को पता नहीं है। मरीजों का पैसा और समय दोनों खराब गरीब और बीमार इंसान 10 रुपए में इलाज की मंशा से सुबह उठकर जल्दी अस्पताल आता है। लंबी लाइन में लगकर पर्ची कटाता है ताकि जल्दी से डॉक्टर से मिले और दवा लेकर घर जा सके। इतना सब करने के बाद भी उसे या तो बार-बार लंबी लाइनों में दवाएं बदलवानी पड़ रही हैं। या फिर हजारों रुपये की दवा बाहर से लेनी पड़ रही है। डॉक्टर पर भी मरीजों का भार बढ़ रहा है। जहां रोजाना जेपी में 1200 से 1500 तक मरीज आते हैं। अगर 50 प्रतिशत मरीज भी दवा बदलवा रहे हैं तो डॉक्टर्स को एक दिन में 2 हजार से ज्यादा मरीजों को देखना पड़ेगा।
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भोपाल के जेपी हॉस्पिटल में दवाओं की कमी:मरीज 40% दवाएं बाहर से खरीद रहे, डॉक्टरों को भी नहीं मिल रहे ग्लव्स और मास्क














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